Wednesday, 19 February 2020
साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं
एक तस्वीर-ए-मुहब्बत है जवानी गोया
जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं
इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें
इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं
आसमां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी
अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं
शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन
अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं
वो इत्तफ़ाक़ से रस्ते में मिल गया था मुझे
वो इत्तफ़ाक़ से रस्ते में मिल गया था मुझे
मैं देखता था उसे और वो देखता था मुझे
अगरचे उसकी नज़र में थी न आशनाई[1]
मैं जानता हूँ कि बरसों से जानता था मुझे
तलाश कर न सका फिर मुझे वहाँ जाकर
ग़लत समझ के जहाँ उसने खो दिया था मुझे
बिखर चुका था अगर मैं, तो क्यों समेटा था
मैं पैरहन[2] था शिकस्ता[3] तो क्यों सिया था मुझे
है मेरा हर्फ़-ए-तमन्ना[4], तेरी नज़र का क़ुसूर
तेरी नज़र ने ही ये हौसला दिया था मुझे