Monday, 10 February 2020
है अभी महताब बाक़ी और बाक़ी है शराब
है अभी महताब बाक़ी और बाक़ी है शराब
और बाक़ी मेरे तेरे दरम्याँ सदहा हिसाब।
दीद अन्दर दीद, हैरानम हेजाब अन्दर हेजाब
वाय बावस्फ़े ईं क़दर-राजो-नयाज़ ईं इजतेनाब।
दिल में यूँ बेदार होते हैं ख़यालाते-ग़ज़ल
आँख मलते जिस तरह उट्ठे कोई मस्ते-शबाब।
गेसू-ए-ख़मदार में अशाआरे-तर की ठँढकें
आतशे-रुख़सार में कल्बे-तपाँ का इल्तहाब।
चूड़ियाँ बजती हैं दिल में, मरहबा, बज़्मे-ख़याल
खिलते जाते हैं निगाहों में जबीनों के गुलाब।
काश पढ़ सकता किसी सूरत से तू आयाते-इश्क़
अहले-दिल भी तो हैं ऐ शेख़े-ज़मा अहले-किताब।
एक आलम पर नहीं रहती है कैफ़ीयाते इश्क़
गाह रेगिस्ताँ भी दरिया, गाह दरिया भी सुराब।
कौन रख सकता है इसको साकिनो-जामिद कि ज़ीस्त
इनक़लाबो - इनक़लाबो - इनक़लाबो - इनक़लाब ।
ढूँढिये क्यों इस्तेआरे और तशबीहो - मिसाल
हुस्न तो वो है बतायें जिसको हुस्ने - लाजवाब ।
हस्त जन्नत की बहारें चन्द पंखडि़यों में बन्द
गुन्चा खिलता है तो फ़िरदौसों के खुल जाते हैं बाब।
आ रहा है नाज़ से सिम्ते - चमन को ख़ुशख़िराम
दोश पर वो गेसू-ए-शबगूँ के मँडलाते सहाब ।
हुस्न ख़ुद अपना नक़ीब, आँखों को देता है पयाम
आमद-आमद आफ़्ताब आमद दलीले-आफ़्ताब।
अज़मते-तक़दीरे-आदम अहले-मज़हब से न पूँछ
जो मशीअत ने न देखे दिल ने देखे हैं वो ख़्वाब।
हुस्न वो जो एक कर दे मानी-ए-फ़त्हो-शिकस्त
रह गयी सौ बार झुक-झुक कर निगाहे कामयाब।
ग़ैब की नज़रे बचा कर कुछ चुरा ले वक़्त से
फिर न हाथ आयेगा कुछ हर लम्हा है पा-दर-रिकाब\।
हर नज़र जलवा है हर जलवा नज़र हैरान हूँ
आज किस बैतुलहरम में हो गया हूँ बारयाब ।
बारहा, हाँ बारहा मैने दमे-फ़िक्रे-सुखन
छू लिया है उस सुकूँ को जो है जाने- इज़्तेराब।
सर से पा तक हुस्न है साज़े-नुमू राज़े - नुमू
आ रहा है एक कमसिन पर दबे पाँवों शबाब।
बज़्मे - फ़ितरत सर-बसर होती है इक बज़्मे - समाअ
वो सुकूते - नीमशब का नग़्मा - ए- चंगो - रबाब।
ऐ ’फ़िराक़’ उठती है हैरत की निगाहें बा अदब
अपने दिल की खिलवतों से हो रहा हूँ बारयाब।
ये सुरमई फ़ज़ाओं की कुछ कुनमुनाहटें
ये सुरमई फ़ज़ाओं की कुछ कुनमुनाहटें
मिलती हैं मुझको पिछले पहर तेरी आहटें।
इस कायनाते-ग़म की फ़सुर्दा फ़ज़ाओं में
बिखरा गये हैं आ के वो कुछ मुस्कुराहटें।
ऐ जिस्मे-नाज़नीने-निगारे-नज़रनवाज़
शुब्हे - शबे - विसाल तेरी मलगज़ाहटें।
पड़ती है आसमाने - मुहब्बत पे छूट-सी
बल - बे - जबीने -नाज़ तेरी जगमगाहटें।
चलती है जब नसीमे - ख़याले- ख़रामे-नाज़
सुनता हूँ दामनों की तेरे सरसराहटें।
चश्मे -सियह तबस्सुमे - पिनहाँ लिये हुये
पौ फूटने से पहले उफ़ुक़ की उदाहटें।
जुम्बिश में जैसे शाख़ हो गुलहा-ए-नग़्मा की
इक पैकरे - जमील की ये लहलहाहटें।
झोकों की नज़्र है, चमने - इन्तिज़ारे -दोस्त
बादे - उम्मीदो - बाम की ये सनसनाहटें।
हो सामना अगर तो ख़िजिल हो निगाहे-बर्क़
देखी हैं अज़्व - अज़्व में वो अचपलाहटें।
किस देस को सिधार गयीं ऐ जमाले - यार
रंगीं लबों प खेल के कुछ मुस्कुराहटें।
रुख़सारे-तर से ताज़ा हो बाग़े-अदन की याद
और उसकी पहली सुब्ह की वो रसमसाहटें।
साज़े - जमाल के नवाहा - ए - सर्मदी
जोबन तो वो फ़रिश्ते सुनें गुनगुनाहटें।
आज़ुर्दगी - ए - हुस्न भी किस दर्जा शोख़ है
अश्कों में तैरती हुई कुछ मुस्कुराहटें।
होने लगा है ख़ुद से करीं ऐ शबे-अलम
मैं पा रहा हूँ हिज्र में कुछ अपनी आहटें।
मेरी ग़ज़ल की जान समझना उन्हें ’फ़िराक़’
शम्मअ-ए- ख़याले - यार की ये थरथराहटें।
आँखों में जो बात हो गयी है
आँखों में जो बात हो गयी है
एक शरहे-हयात हो गयी है।
जब दिल की वफ़ात हो गयी है
हर चीज की रात हो गयी है।
ग़म से छुट कर ये ग़म है मुझको
क्यों ग़म से नजात हो गयी है।
मुद्दत से खबर मिली न दिल को
शायद कोई बात हो गयी है।
जिस शै पर नज़र पड़ी है तेरी
तस्वीरे-हयात हो गयी है।
दिल में तुझ से थी जो शिकायत
अब ग़म के निकात हो गयी है।
इक़रारे-गुनाहे-इश्क़ सुन लो
मुझसे इस बात हो गयी है।
जो चीज भी मुझको हाथ आयी
तेरी सौगात हो गयी है।
क्या जानिये पहले मौत क्या थी
अब मेरी हयात हो गयी है।
घटते-घटते तेरी इनायत
मेरी औक़ात हो गयी है।
उस चस्मे-सियह की याद अक्सर
शामे-जुल्मात हो गयी है।
इस दौर में जिन्दगी बसर की
बीमार की रात हो गयी है।
जीती हुई बाज़ी-ए-मुहब्बत
खेला हूँ तो मात हो गयी है।
मिटने लगीं ज़िन्दगी की कद्रें
जब ग़म से नजात हो गयी है।
वो चाहें तो वक़्त भी बदल जाय
जब आये हैं, रात हो गयी है।
दुनिया है कितनी बे-ठिकाना
आशिक़ की बरात हो गयी है।
पहले वो निगाह इक किरन थी
अब बर्क़-सिफ़ात हो गयी है।
जिस चीज को छू दिया है तूने
एक बर्गे-नबात हो गयी है।
इक्का-दुक्का सदाये-जंजीर
जिन्दाँ में रात हो गयी है।
एक-एक सिफ़त ’फ़िराक़’ उसकी
देखा है तो ज़ात हो गयी है।