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Saturday, 29 December 2018
अस्त्र शस्त्र रोक आब मामिलाक मारि।
अस्त्र शस्त्र रोक आब मामिलाक मारि।
भाइ भाइकेँ पढ़ैछ नित्य नित्य गारि॥
ठक्क लोक हक्क पाब साधु कैँ उजारि।
दैव जे ललाट लेख के सकैछ टारि?
चाही नहि धन, ललितवाम, पकवान जिलेबी,
मनोविनोदक हेतु अमरपति सदन न टेबी।
ई अन्तर अभिलाष हमर करुणामयि देवी
भक्ति भाव सँ सतत अहिंक पदपंकज सेवी॥
अन्न महग, डगमग अछि भारत, हयत कोना निस्तारा
उत्तर पश्चिम भूमि अगम्या पर्वत असह तुषारा।
धर्म-विरोधी सहसह करइछ, कुमत कथा विस्तारा
करथु कृपा जगजननी देवी महिसीवाली तारा॥
मिथिला की छलि की भय गेलि,
याज्ञवल्क्य मुनि, जनक नृपतिवर
ज्ञान भक्ति सौं गेलि।
वाचस्पति मिश्रादि जगद्गुरु
निर्जित बौद्ध झमेलि
से शारदा स्वर्ग जनि गेली
बढ़ल कुविद्या केलि।
वर्णाश्रम विधि ककरहु रुचि नहि
श्रुति श्रद्धाकेँ ठेलि
पूजा पाठ ध्यान वकमुद्रा
सभटा वंचन खेलि।
कह कविचन्द्र कचहरी भरिदिन
बहुत भोग कर जेलि,
कलह कराय धर्म धन नाशे
कलिक दरिद्रा चेलि।
भाइ भाइकेँ पढ़ैछ नित्य नित्य गारि॥
ठक्क लोक हक्क पाब साधु कैँ उजारि।
दैव जे ललाट लेख के सकैछ टारि?
चाही नहि धन, ललितवाम, पकवान जिलेबी,
मनोविनोदक हेतु अमरपति सदन न टेबी।
ई अन्तर अभिलाष हमर करुणामयि देवी
भक्ति भाव सँ सतत अहिंक पदपंकज सेवी॥
अन्न महग, डगमग अछि भारत, हयत कोना निस्तारा
उत्तर पश्चिम भूमि अगम्या पर्वत असह तुषारा।
धर्म-विरोधी सहसह करइछ, कुमत कथा विस्तारा
करथु कृपा जगजननी देवी महिसीवाली तारा॥
मिथिला की छलि की भय गेलि,
याज्ञवल्क्य मुनि, जनक नृपतिवर
ज्ञान भक्ति सौं गेलि।
वाचस्पति मिश्रादि जगद्गुरु
निर्जित बौद्ध झमेलि
से शारदा स्वर्ग जनि गेली
बढ़ल कुविद्या केलि।
वर्णाश्रम विधि ककरहु रुचि नहि
श्रुति श्रद्धाकेँ ठेलि
पूजा पाठ ध्यान वकमुद्रा
सभटा वंचन खेलि।
कह कविचन्द्र कचहरी भरिदिन
बहुत भोग कर जेलि,
कलह कराय धर्म धन नाशे
कलिक दरिद्रा चेलि।
न्यायक भवन कचहरी नाम।
न्यायक भवन कचहरी नाम।
सभ अन्याय भरल तेहि ठाम॥
सत्य वचन विरले जन भाष।
सभ मन धनक हरन अभिलाष॥
कपट भरल कत कोटिक कोटि॥
ककर न कर मर्यादा छोटि॥
मन कवि ‘चन्द्र’ कचहरी घूस।
सभ सहमत ककरा के दू स?
सभ अन्याय भरल तेहि ठाम॥
सत्य वचन विरले जन भाष।
सभ मन धनक हरन अभिलाष॥
कपट भरल कत कोटिक कोटि॥
ककर न कर मर्यादा छोटि॥
मन कवि ‘चन्द्र’ कचहरी घूस।
सभ सहमत ककरा के दू स?
सुमरु सुमरु मन! शंकर समय भयंकर जानि।
सुमरु सुमरु मन! शंकर समय भयंकर जानि।
ककर हृदय नहि कलुषित शासन कलि नृप पानि॥
केवल शिव करुणाकर सेवयित नहि जन हानि॥
भक्ति कल्पलति जानह परम परशमनि खानि॥
कतहु विषयमे न लागह त्यागह अनुचित मानि।
सुखसौँ अन्त विलसबह ‘चन्द्र’ चूड़ रजधानि॥
ककर हृदय नहि कलुषित शासन कलि नृप पानि॥
केवल शिव करुणाकर सेवयित नहि जन हानि॥
भक्ति कल्पलति जानह परम परशमनि खानि॥
कतहु विषयमे न लागह त्यागह अनुचित मानि।
सुखसौँ अन्त विलसबह ‘चन्द्र’ चूड़ रजधानि॥
समय केहन भेल घोर हे शिव!
समय केहन भेल घोर हे शिव!
गोधन विपति, धरम अवनति देखि कत हिय करब कठोर॥
साधु समाज राजसँ पीड़ित अति हरषित-चित चोर।
अकुलिन लोकेँ धरणि परिपूरित कुलिन समादर थोड़॥
धरम सुनीति प्रीति ककरहु नहि, खलहिक चलइछ जोर।
कन्द-मूल-फल सेहो अब दुरलभ अन्न गेल देशक ओर॥
किछु शुभ साधन बनि नहि पड़इछ थाकल मन, मति भोर।
कह कवि चन्द्र हमर दुख मेटत होयत कृपा शिव तोर॥
गोधन विपति, धरम अवनति देखि कत हिय करब कठोर॥
साधु समाज राजसँ पीड़ित अति हरषित-चित चोर।
अकुलिन लोकेँ धरणि परिपूरित कुलिन समादर थोड़॥
धरम सुनीति प्रीति ककरहु नहि, खलहिक चलइछ जोर।
कन्द-मूल-फल सेहो अब दुरलभ अन्न गेल देशक ओर॥
किछु शुभ साधन बनि नहि पड़इछ थाकल मन, मति भोर।
कह कवि चन्द्र हमर दुख मेटत होयत कृपा शिव तोर॥
महेश_बाणी
फिरलहुँ देश विदेश हे शिव
दुख धन्धा मध नबजन व्याकुल केओ नहि रहित कलेश।।
जठरानल कारण जन हलचल, देखल नाना वेष।
साधु असाधु हृदय भरि पूरल, केवल लोभ प्रवेश।।
अपने अपन मन मलिन न जानथि, अनका कर उपदेश।
क्रोध प्रचंड बोध परिशुद्ध न, नहि मन ज्ञानक लेश।।
टूटल दशन वदन छविओ नहि, सन सन भए गेल केश।।
कह कवि चन्द्र अपन बुतें किछु नहि, मालिक एक महेश।
दुख धन्धा मध नबजन व्याकुल केओ नहि रहित कलेश।।
जठरानल कारण जन हलचल, देखल नाना वेष।
साधु असाधु हृदय भरि पूरल, केवल लोभ प्रवेश।।
अपने अपन मन मलिन न जानथि, अनका कर उपदेश।
क्रोध प्रचंड बोध परिशुद्ध न, नहि मन ज्ञानक लेश।।
टूटल दशन वदन छविओ नहि, सन सन भए गेल केश।।
कह कवि चन्द्र अपन बुतें किछु नहि, मालिक एक महेश।
शिव-राग
शिव निन्दा जनु रटु वटु कटु लगइत अछि कान।
प्राणहुँ सौं से अधिक छथि देव देव भगवान।।
दरशन शास्त्र निपुण अहाँ सकल वरन परधान।
किअ हिअ देलनि एहेन विधि दारूण कुलिश समान।।
भोजन करू मन इच्छित शिक्षित करू जनु नारि।
ओ विभु सम जनितहिं छथि हृदय गुपुत त्रिपुरारि।।
कह कवि चन्द्र उमा प्रण वचहिं के सक टारि।
शिव पालक सभ लोकक अपने भेष भिखारि।।
प्राणहुँ सौं से अधिक छथि देव देव भगवान।।
दरशन शास्त्र निपुण अहाँ सकल वरन परधान।
किअ हिअ देलनि एहेन विधि दारूण कुलिश समान।।
भोजन करू मन इच्छित शिक्षित करू जनु नारि।
ओ विभु सम जनितहिं छथि हृदय गुपुत त्रिपुरारि।।
कह कवि चन्द्र उमा प्रण वचहिं के सक टारि।
शिव पालक सभ लोकक अपने भेष भिखारि।।
राधा-विरह
भासलि नाव अगम जल सजनी पवन बहय बड़-जोर।।
एकसरि नारी कुदनि फल सजनी हठ मति नन्दकिशोर।।
के कह की गति होइत सजनी थर थर जिव मोर काँप।।
दुर जनि एक न होयति सजनी प्रगटल पुरविल पाप।।
जननी हमर जरातुर सजनी तकइति हयतिह वाट।।
विकल हृदय नहिं किछु फुर सजनी की विधि लिखल ललाट।।
कृष्ण ‘चन्द्र’ कर सोपल सजनी दुरलभ अपन शरीर।।
मनमथ दृढ़ आरोपल सजनी जिवइत देखवन तीर।।
एकसरि नारी कुदनि फल सजनी हठ मति नन्दकिशोर।।
के कह की गति होइत सजनी थर थर जिव मोर काँप।।
दुर जनि एक न होयति सजनी प्रगटल पुरविल पाप।।
जननी हमर जरातुर सजनी तकइति हयतिह वाट।।
विकल हृदय नहिं किछु फुर सजनी की विधि लिखल ललाट।।
कृष्ण ‘चन्द्र’ कर सोपल सजनी दुरलभ अपन शरीर।।
मनमथ दृढ़ आरोपल सजनी जिवइत देखवन तीर।।
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