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Saturday, 29 December 2018
आप अगर हमको मिल गये होते
आप अगर हमको मिल गये होते
बाग़ में फूल खिल गये होते
आप ने यूँ ही घूर कर देखा
होंठ तो यूँ भी सिल गये होते
काश हम आप इस तरह मिलते
जैसे दो वक़्त मिल गये होते
हमको अहल-ए-ख़िरद मिले ही नहीं
वरना कुछ मुन्फ़ईल गये होते
उसकी आँखें ही कज-नज़र थीं 'अदम'
दिल के पर्दे तो हिल गये होते
बाग़ में फूल खिल गये होते
आप ने यूँ ही घूर कर देखा
होंठ तो यूँ भी सिल गये होते
काश हम आप इस तरह मिलते
जैसे दो वक़्त मिल गये होते
हमको अहल-ए-ख़िरद मिले ही नहीं
वरना कुछ मुन्फ़ईल गये होते
उसकी आँखें ही कज-नज़र थीं 'अदम'
दिल के पर्दे तो हिल गये होते
बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे
बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे
बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे
बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे
ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे
फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे
बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे
'अदम' भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे
बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे
बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे
ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे
फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे
बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे
'अदम' भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे
Friday, 28 December 2018
अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे
या समात का भरम है या किसी नग़्में की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे
किसने खोला है हवा में गेसूओं को नाज़ से
नर्मरौ बरसात की आवाज़ आती है मुझे
उस की नाज़ुक उँगलियों को देख कर अक्सर 'अदम'
एक हल्की सी सदा-ए-साज़ आती है मुझे
दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे
या समात का भरम है या किसी नग़्में की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे
किसने खोला है हवा में गेसूओं को नाज़ से
नर्मरौ बरसात की आवाज़ आती है मुझे
उस की नाज़ुक उँगलियों को देख कर अक्सर 'अदम'
एक हल्की सी सदा-ए-साज़ आती है मुझे
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
जिनिको पीने की आस हो साक़ी
आज इतनी पिला दे आँखों से
ख़त्म रिंदों की प्यास हो साक़ी
हल्क़ा हल्क़ा सुरूर है साक़ी
बात कोई ज़रूर है साक़ी
तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी
तेरी आँखों को कर दिया सजदा
मेरा पहला क़ुसूर है साक़ी
तेरे रुख़ पे ये परेशाँ ज़ुल्फ़ें
इक अँधेरे में नूर है साक़ी
तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी
पीने वालों को भी नहीं मालूम
मैकदा कितनी दूर है साक़ी
जिनिको पीने की आस हो साक़ी
आज इतनी पिला दे आँखों से
ख़त्म रिंदों की प्यास हो साक़ी
हल्क़ा हल्क़ा सुरूर है साक़ी
बात कोई ज़रूर है साक़ी
तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी
तेरी आँखों को कर दिया सजदा
मेरा पहला क़ुसूर है साक़ी
तेरे रुख़ पे ये परेशाँ ज़ुल्फ़ें
इक अँधेरे में नूर है साक़ी
तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी
पीने वालों को भी नहीं मालूम
मैकदा कितनी दूर है साक़ी
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को
ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे
तेरे गेसूओं के मुक़द्दस अँधेरे
किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनक़ें हैं फ़क़ीरों के डेरे
ग़म-ए-ज़िन्दगी को 'अदम' साथ लेकर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे
बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को
ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे
तेरे गेसूओं के मुक़द्दस अँधेरे
किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनक़ें हैं फ़क़ीरों के डेरे
ग़म-ए-ज़िन्दगी को 'अदम' साथ लेकर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे
सूरज की हर किरण तेरी सूरत पे वार दूँ
सूरज की हर किरण तेरी सूरत पे वार दूँ
दोज़ख़ को चाहता हूँ कि जन्नत पे वार दूँ
इतनी सी है तसल्ली कि होगा मुक़ाबला
दिल क्या है जाँ भी अपनी क़यामत पे वार दूँ
इक ख़्वाब था जो देख लिया नीन्द में कभी
इक नीन्द है जो तेरी मुहब्बत पे वार दूँ
'अदम' हसीन नीन्द मिलेगी कहाँ मुझे
फिर क्यूँ न ज़िन्दगानी को तुर्बत पे वार दूँ
दोज़ख़ को चाहता हूँ कि जन्नत पे वार दूँ
इतनी सी है तसल्ली कि होगा मुक़ाबला
दिल क्या है जाँ भी अपनी क़यामत पे वार दूँ
इक ख़्वाब था जो देख लिया नीन्द में कभी
इक नीन्द है जो तेरी मुहब्बत पे वार दूँ
'अदम' हसीन नीन्द मिलेगी कहाँ मुझे
फिर क्यूँ न ज़िन्दगानी को तुर्बत पे वार दूँ
अपनी ज़ुल्फ़ों को सितारों के हवाले कर दो
अपनी ज़ुल्फ़ों को सितारों के हवाले कर दो
शहर-ए-गुल बादागुसारों के हवाले कर दो
तल्ख़ि-ए-होश हो या मस्ती-ए-इदराक-ए-जुनूँ
आज हर चीज़ बहारों के हवाले कर दो
मुझ को यारो न करो रहनुमाओं के सुपुर्द
मुझ को तुम रहगुज़ारों के हवाले कर दो
जागने वालों का तूफ़ाँ से कर दो रिश्ता
सोने वालों को किनारों के हवाले कर दो
मेरी तौबा का बजा है यही एजाज़ 'अदम'
मेरा साग़र मेरे यारों के हवाले कर दो
शहर-ए-गुल बादागुसारों के हवाले कर दो
तल्ख़ि-ए-होश हो या मस्ती-ए-इदराक-ए-जुनूँ
आज हर चीज़ बहारों के हवाले कर दो
मुझ को यारो न करो रहनुमाओं के सुपुर्द
मुझ को तुम रहगुज़ारों के हवाले कर दो
जागने वालों का तूफ़ाँ से कर दो रिश्ता
सोने वालों को किनारों के हवाले कर दो
मेरी तौबा का बजा है यही एजाज़ 'अदम'
मेरा साग़र मेरे यारों के हवाले कर दो
सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं
सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं
हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं
ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में
हमें गले से लगओ बहार के दिन हैं
ठहर ठहर के न बरसो उमड़ पड़ो यक दम
सितमगरी से घटाओ बहार के दिन हैं
शिकस्ता-ए-तौबा का कब ऐसा आयेगा मौसम
'अदम' को घेर के लाओ बहार के दिन हैं
हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं
ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में
हमें गले से लगओ बहार के दिन हैं
ठहर ठहर के न बरसो उमड़ पड़ो यक दम
सितमगरी से घटाओ बहार के दिन हैं
शिकस्ता-ए-तौबा का कब ऐसा आयेगा मौसम
'अदम' को घेर के लाओ बहार के दिन हैं
हँस के बोला करो बुलाया करो
हँस के बोला करो बुलाया करो
आप का घर है आया जाया करो
मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर
रूप बढ़ता है मुस्कुराया करो
हदसे बढ़कर हसीन लगते हो
झूठी क़स्में ज़रूर खाया करो
हुक्म करना भी एक सख़ावत है
हम को ख़िदमत कोई बताया करो
बात करना भी बादशाहत है
बात करना न भूल जाया करो
ता के दुनिय की दिलकशी न घटे
नित नये पैरहन में आया करो
कितने सादा मिज़ाज हो तुम 'अदम'
उस गली में बहुत न जाया करो
आप का घर है आया जाया करो
मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर
रूप बढ़ता है मुस्कुराया करो
हदसे बढ़कर हसीन लगते हो
झूठी क़स्में ज़रूर खाया करो
हुक्म करना भी एक सख़ावत है
हम को ख़िदमत कोई बताया करो
बात करना भी बादशाहत है
बात करना न भूल जाया करो
ता के दुनिय की दिलकशी न घटे
नित नये पैरहन में आया करो
कितने सादा मिज़ाज हो तुम 'अदम'
उस गली में बहुत न जाया करो
साग़र से लब लगा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
साग़र से लब लगा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
सहन-ए-चमन में आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
आ जाओ और भी ज़रा नज़दीक जान-ए-मन
तुम को क़रीब पाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
होता कोई महल भी तो क्या पूछते हो फिर
बे-वजह मुस्कुरा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
साहिल पे भी तो इतनी शगुफ़ता रविश न थी
तूफ़ाँ के बीच आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
वीरान दिल है और 'अदम' ज़िन्दगी का रक़्स
जंगल में घर बनाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
सहन-ए-चमन में आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
आ जाओ और भी ज़रा नज़दीक जान-ए-मन
तुम को क़रीब पाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
होता कोई महल भी तो क्या पूछते हो फिर
बे-वजह मुस्कुरा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
साहिल पे भी तो इतनी शगुफ़ता रविश न थी
तूफ़ाँ के बीच आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
वीरान दिल है और 'अदम' ज़िन्दगी का रक़्स
जंगल में घर बनाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी
जब गर्दिशों में जाम थे
जब गर्दिशों में जाम थे
कितने हसीं अय्याम थे
हम ही न थे रुसवा फ़क़त
वो आप भी बदनाम थे
कहते हैं कुछ अर्सा हुआ
क़ाबे में भी असनाम थे
अंजाम की क्या सोचते
ना-वाक़िफ़-ए- अंजाम थे
अहद-ए-जवानी में 'अदम'
सब लोग गुलअन्दां थे
कितने हसीं अय्याम थे
हम ही न थे रुसवा फ़क़त
वो आप भी बदनाम थे
कहते हैं कुछ अर्सा हुआ
क़ाबे में भी असनाम थे
अंजाम की क्या सोचते
ना-वाक़िफ़-ए- अंजाम थे
अहद-ए-जवानी में 'अदम'
सब लोग गुलअन्दां थे
फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये
फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये
बिजली गिरे तो जश्न-ए-चराग़ाँ मनाइये
कलियों के अंग अंग में मीठा सा दर्द है
बीमार निकहतों को ज़रा गुदगुदाइये
कब से सुलग रही है जवानी की गर्म रात
ज़ुल्फ़ें बिखेर कर मेरे पहलू में आइये
बहकी हुई सियाह घटाओं के साथ साथ
जी चाहता है शाम-ए-अबद तक तो जाइये
सुन कर जिसे हवास में ठन्डक सी आ बसे
ऐसी कोई उदास कहानी सुनाइये
रस्ते पे हर क़दम पे ख़राबात हैं 'अदम'
ये हाल हो तो किस तरह दामन बचाइये
बिजली गिरे तो जश्न-ए-चराग़ाँ मनाइये
कलियों के अंग अंग में मीठा सा दर्द है
बीमार निकहतों को ज़रा गुदगुदाइये
कब से सुलग रही है जवानी की गर्म रात
ज़ुल्फ़ें बिखेर कर मेरे पहलू में आइये
बहकी हुई सियाह घटाओं के साथ साथ
जी चाहता है शाम-ए-अबद तक तो जाइये
सुन कर जिसे हवास में ठन्डक सी आ बसे
ऐसी कोई उदास कहानी सुनाइये
रस्ते पे हर क़दम पे ख़राबात हैं 'अदम'
ये हाल हो तो किस तरह दामन बचाइये
जो लोग जान बूझ के नादान बन गये
जो लोग जान बूझ के नादान बन गये
मेरा ख़याल है कि वो इंसान बन गये
हम हश्र में गये मगर कुछ न पूछिये
वो जान बूझ कर वहाँ अन्जान बन गये
हँसते हैं हम को देख के अर्बाब-ए-आगही
हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गये
मझधार तक पहुँचना तो हिम्मत की बात थी
साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गये
इन्सानियत की बात तो इतनी है शैख़ जी
बदक़िस्मती से आप भी इंसान बन गये
काँटे बहुत थे दामन-ए-फ़ितरत में ऐ 'अदम'
कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गये
मेरा ख़याल है कि वो इंसान बन गये
हम हश्र में गये मगर कुछ न पूछिये
वो जान बूझ कर वहाँ अन्जान बन गये
हँसते हैं हम को देख के अर्बाब-ए-आगही
हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गये
मझधार तक पहुँचना तो हिम्मत की बात थी
साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गये
इन्सानियत की बात तो इतनी है शैख़ जी
बदक़िस्मती से आप भी इंसान बन गये
काँटे बहुत थे दामन-ए-फ़ितरत में ऐ 'अदम'
कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गये
मैकदा था चाँदनी थी मैं न था
मैकदा था चाँदनी थी मैं न था
इक मुजस्सम बेख़ुदी थी मैं न था
इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था
तूर पर छेड़ा था जिसने आप को
वो मेरी दीवांगी थी मैं न था
मैकदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तश्नगी थी मैं न था
मैं और उस ग़ुंचादहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था
गेसूओं के साये में आराम-कश
सर-बरहना ज़िन्दगी थी मैं न था
रदै-ओ-काबा में 'अदम' हैरत-फ़रोश
दो जहाँ की बदज़नी थी मैं न था
इक मुजस्सम बेख़ुदी थी मैं न था
इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था
तूर पर छेड़ा था जिसने आप को
वो मेरी दीवांगी थी मैं न था
मैकदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तश्नगी थी मैं न था
मैं और उस ग़ुंचादहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था
गेसूओं के साये में आराम-कश
सर-बरहना ज़िन्दगी थी मैं न था
रदै-ओ-काबा में 'अदम' हैरत-फ़रोश
दो जहाँ की बदज़नी थी मैं न था
फूलों की आरज़ू में बड़े ज़ख़्म खाये हैं
फूलों की आरज़ू में बड़े ज़ख़्म खाये हैं
लेकिन चमन के ख़ार भी अब तक पराये हैं
उस पर हराम है ग़म-ए-दौराँ की तल्ख़ियाँ
जिसके नसीब में तेरी ज़ुल्फ़ों के साये हैं
महशर में ले गैइ थी तबियत की सादगी
लेकिन बड़े ख़ुलूस से हम लौट आये हैं
आया हूँ याद बाद-ए-फ़ना उनको भी 'अदम
क्या जल्द मेरे सीख पे इमान लाये हैं
लेकिन चमन के ख़ार भी अब तक पराये हैं
उस पर हराम है ग़म-ए-दौराँ की तल्ख़ियाँ
जिसके नसीब में तेरी ज़ुल्फ़ों के साये हैं
महशर में ले गैइ थी तबियत की सादगी
लेकिन बड़े ख़ुलूस से हम लौट आये हैं
आया हूँ याद बाद-ए-फ़ना उनको भी 'अदम
क्या जल्द मेरे सीख पे इमान लाये हैं
सुना है लोग बड़े दिलनवाज़ होते है
सुना है लोग बड़े दिलनवाज़ होते है
मगर नसीब कहाँ कारसाज़ होते है
सुना है पीरे-मुगां से ये बारहा मैंने
छलक पड़े तो प्यालें भी साज़ होते है
किसी की ज़ुल्फ़ से वाबिस्तागी नहीं अच्छी
ये सिलसिले दिलेनादा दराज़ होते है
वो आईने के मुकाबिल हो जब खुदा बन कर
अदा-ओ-नाज़ सरापा नमाज़ होते है
'अदम' ख़ुलूस के बन्दों में एक खामी है
सितम ज़रीफ़ बड़े जल्दबाज़ होते है
मगर नसीब कहाँ कारसाज़ होते है
सुना है पीरे-मुगां से ये बारहा मैंने
छलक पड़े तो प्यालें भी साज़ होते है
किसी की ज़ुल्फ़ से वाबिस्तागी नहीं अच्छी
ये सिलसिले दिलेनादा दराज़ होते है
वो आईने के मुकाबिल हो जब खुदा बन कर
अदा-ओ-नाज़ सरापा नमाज़ होते है
'अदम' ख़ुलूस के बन्दों में एक खामी है
सितम ज़रीफ़ बड़े जल्दबाज़ होते है
अब्दुल हमीद के शेर
ऐ दोस्त मोहब्बत के सदमे तन्हा ही उठाने पड़ते हैं
रह-बर तो फ़क़त इस रस्ते में दो गाम सहारा देते हैं.
बढ़ के तूफ़ान को आगोश में ले-ले अपनी
डूबने वाले तेरे हाथ से साहिल तो गया.
देखा है किस निगाह से तू ने सितम-ज़रीफ़
महसूस हो रहा है मैं ग़र्क़-ए-शराब हूँ.
दिल अभी अच्छी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए.
दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर
मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है.
गुलों को खिल के मुरझाना पड़ा है
तबस्सुम की सज़ा कितनी बड़ी है.
इंसाँ हूँ अदम और ये यजदाँ को ख़बर है
जंनत मेरे असलाफ़ की ठुकराई हुई है.
कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मै-कदे से मेरी जवानी उठा के ला.
लोग कहते हैं के तुम से ही मोहब्बत है मुझे
तुम जो कहते हो के वहशत है तो वहशत होगी.
महशर में इक सवाल किया था करीम ने
मुझ से वहाँ भी आप की तारीफ़ हो गई.
मर ने वाले तो ख़ैर हैं बे-बस
जी ने वाले कमाल करते हैं.
मुझे तौबा का पूरा अज्र मिलता है उसी साअत
कोई ज़ोहरा-जबीं पी ने पे जब मजबूर करता है.
साक़ी मुझे शराब की तोहमत नहीं पसंद
मुझ को तेरी निगाह का इल्ज़ाम चाहिए.
सवाल कर के मैं ख़ुद ही बहुत पशेमाँ हूँ
जवाब दे के मुझे और शर्म-सार न कर.
सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही.
ज़ाहिद शराब पी ने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो.
ज़बान-ए-होश से ये कुफ़्र सरज़द हो नहीं सकता
मैं कैसे बिन पिए ले लूँ ख़ुदा का नाम ऐ साक़ी.
ज़रा एक तबस्सुम की तकलीफ़ करना
के गुलज़ार में फूल मुरझा रहें हैं.
ज़िंदगी नाम है रवानी का
क्या थमेगा बहाव पानी का.
रह-बर तो फ़क़त इस रस्ते में दो गाम सहारा देते हैं.
बढ़ के तूफ़ान को आगोश में ले-ले अपनी
डूबने वाले तेरे हाथ से साहिल तो गया.
देखा है किस निगाह से तू ने सितम-ज़रीफ़
महसूस हो रहा है मैं ग़र्क़-ए-शराब हूँ.
दिल अभी अच्छी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए.
दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर
मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है.
गुलों को खिल के मुरझाना पड़ा है
तबस्सुम की सज़ा कितनी बड़ी है.
इंसाँ हूँ अदम और ये यजदाँ को ख़बर है
जंनत मेरे असलाफ़ की ठुकराई हुई है.
कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मै-कदे से मेरी जवानी उठा के ला.
लोग कहते हैं के तुम से ही मोहब्बत है मुझे
तुम जो कहते हो के वहशत है तो वहशत होगी.
महशर में इक सवाल किया था करीम ने
मुझ से वहाँ भी आप की तारीफ़ हो गई.
मर ने वाले तो ख़ैर हैं बे-बस
जी ने वाले कमाल करते हैं.
मुझे तौबा का पूरा अज्र मिलता है उसी साअत
कोई ज़ोहरा-जबीं पी ने पे जब मजबूर करता है.
साक़ी मुझे शराब की तोहमत नहीं पसंद
मुझ को तेरी निगाह का इल्ज़ाम चाहिए.
जवाब दे के मुझे और शर्म-सार न कर.
सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही.
ज़ाहिद शराब पी ने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो.
ज़बान-ए-होश से ये कुफ़्र सरज़द हो नहीं सकता
मैं कैसे बिन पिए ले लूँ ख़ुदा का नाम ऐ साक़ी.
ज़रा एक तबस्सुम की तकलीफ़ करना
के गुलज़ार में फूल मुरझा रहें हैं.
ज़िंदगी नाम है रवानी का
क्या थमेगा बहाव पानी का.
कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं
कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं
आप की रग़बत ओ रज़ा हूँ मैं
मैं ने जब साज़ छेड़ना चाहा
ख़ामुशी चीख़ उठी सदा हूँ मैं
हश्र की सुब्ह तक तो जागूँगा
रात का आख़िरी दिया हूँ मैं
आप ने मुझ को ख़ूब पहचाना
वाक़ई सख़्त बे-वफ़ा हूँ मैं
मैं ने समझा था मैं मोहब्बत हूँ
मैं ने समझा था मुद्दआ हूँ मैं
काश मुझ को कोई बताए 'अदम'
किस परी-वश की बद-दुआ हूँ मैं.
आप की रग़बत ओ रज़ा हूँ मैं
मैं ने जब साज़ छेड़ना चाहा
ख़ामुशी चीख़ उठी सदा हूँ मैं
हश्र की सुब्ह तक तो जागूँगा
रात का आख़िरी दिया हूँ मैं
आप ने मुझ को ख़ूब पहचाना
वाक़ई सख़्त बे-वफ़ा हूँ मैं
मैं ने समझा था मैं मोहब्बत हूँ
मैं ने समझा था मुद्दआ हूँ मैं
काश मुझ को कोई बताए 'अदम'
किस परी-वश की बद-दुआ हूँ मैं.
ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया
साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया
पहले मेरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मेरे ख़ुलूस को बद-नाम कर दिया
कितनी दुआएँ दूँ तेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसी सिलसिला-ए-दाम कर दिया
वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी 'अदम'
ख़ुद होश में रही हमें बद-नाम कर दिया.
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया
साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया
पहले मेरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मेरे ख़ुलूस को बद-नाम कर दिया
कितनी दुआएँ दूँ तेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसी सिलसिला-ए-दाम कर दिया
वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी 'अदम'
ख़ुद होश में रही हमें बद-नाम कर दिया.
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