Saturday, 8 December 2018
किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे शबो-रोज़े-आशनाई, महो-साल तक न पहुंचे
किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे
शबो-रोज़े-आशनाई, महो-साल तक न पहुंचे
वो नज़र बहम न पहुंची कि मुहीते-हुस्न करते
तिरी दीद के वसीले ख़द्दो-ख़ाल तक न पहुंचे
वही चश्मा-ए-बका था, जिसे सब सुराब समझे
वही ख़वाब मोतबर थे, जो ख़्याल तक न पहुंचे
तिरा लुत्फ़ वजहे-तसकीं, न करारे-शरहे-ग़म से
कि हैं दिल में वह गिले भी, जो मलाल तक न पहुंचे
कोई यार यां से गुज़रा, कोई होश से न गुज़रा
ये नदीमे-यक-दो-साग़र, मिरे हाल तक न पहुंचे
चलो 'फ़ैज़' दिल जलायें, करें फिर से अरज़े-जानां
वो सुख़न जो लब तक आये, पै सवाल तक न पहुंचे
हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई
हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई
जिस बार ख़िजां आई समझे कि बहार आई
आशोबे-नज़र से की हमने चमन-आराई,
जो शै भी नज़र आई गुलरंग नज़र आई
उमीदे-तलत्तुफ़ में रंजीदा रहे दोनों-
तू और तिरी महफ़िल, मैं और मिरी तनहाई
वां मिल्लते-बुलहवसां और शोरे-वफ़ाजूई
यां ख़िलवते-कमसुख़नां और लज़्ज़ते-रुसवाई
यकजान न हो सकिये, अनजान न बन सकिये
यों टूट गई दिल में शमशीरे-शनासाई
इस तन की तरफ़ देखो जो कत्लगहे-दिल है
क्या रक्खा है मकत्ल में, ऐ चश्मे-तमाशाई