Wednesday, 2 January 2019
याँ किये ग़म है जो गिर्या ने असर छोड़ दिया, yaa kiye gam hai jo
याँ किये ग़म है जो गिर्या ने असर छोड़ दिया
हम ने तो शग़्ल ही दे दीद-ए-तर छोड़ दिया
दिल-ए-बे-ताब का कुछ ध्यान न आया उस दम
हाए क्यूँ हमने उसे वक़्त-ए-सहर छोड़ दिया
क्या सताए नहीं जाते हैं वलेकिन चुप हैं
शिकवा करना तेरा ए रश्क-ए-क़मर छोड़ दिया
दम-ए-रूख़्सत कभी कुछ दिल की तमन्ना न कही
दामन-ए-यार उधर पकड़ा इधर छोड़ दिया
दिल की उल्फ़त न सही प्यारे की बातें न सही
देखना भी तो इधर एक नज़र छोड़ दिया
ग़ैर के धोखे में ख़त ले के मेरा क़ासिद से
पढ़ने को पढ़ तो लिया नाम मगर छोड़ दिया
तुम से कुछ कहने को था भूल गया, tumse kuch kahna to tha bhul gaya
तुम से कुछ कहने को था भूल गया
हाए क्या बात थी क्या भूल गया
भोली भोली जो वो सूरत देखी
शिकवा-ए-जौर-ओ-जफ़ा भूल गया
दिल में बैठा है ये ख़ौफ़ उस बुत का
हाथ उट्ठे के दुआ भूल गया
ख़ुश हूँ इस वादा-फरामोशी से
उस ने हँस कर तो कहा भूल गया
हाल-ए-दिल सुनते ही किस लुत्फ़ से हाए
कुछ कहा कुछ जो रहा भूल गया
वाँ किस उम्मीद पे फिर जाए कोई
ऐ दिल उस बात को क्या भूल गया
होश में आ के सुना कुछ क़ासिद
याद क्या है तुझे क्या भूल गया
अहद क्या था मुझे कुछ याद नहीं
यही गर भूल गया भूल गया
मैं इधर भूल गया रंज-ए-फिराक
वो उधर उज्र-ए-जफ़ा भूल गया
याद में एक सनम की नासेह
मैं तो सब कुछ ब-ख़ुदा भूल गया
ख़ैर मुझ पर तो जो गुज़री गुज़री
शुक्र वो तर्ज़-ए-वफ़ा भूल गया
याद उस की है मेरी ज़ीस्त ‘निज़ाम’
मौत आई जो ज़रा भूल गया
साफ़ बातों में तो कुदूरत है Saaf Baato mei to kudurat hai
साफ़ बातों में तो कुदूरत है
और लगावट से ज़ाहिर उल्फ़त है
ग़ैर से भी कभी तो बिगड़ेगी
रूठना तो तुम्हारी आदत है
आप के लुत्फ़ में तो शक ही नहीं
दिल को किस बात की शिकायत है
उस सितम-गर से शिकवा कैसे हो
और उल्टी मुझे निदामत है
बोले दिखला के आईना शब-ए-वस्ल
देखिए तो यही वो सूरत है
मौत को भी नज़र नहीं आता
ना-तवानी नहीं क़यामत है
कुछ कहा होगा उस ने भी क़ासिद
कुछ न कुछ तेरी भी शरारत है
कहो सब कुछ न रूठने की कहो
ये ही कहना तुम्हारा आफ़त है
वाह क्या तेरी शाएरी है ‘निज़ाम’
क्या फ़साहत है क्या बलाग़त है
कभी मिलते थे वो हम से ज़माना याद आता ह ैjamana yaad aata hai
कभी मिलते थे वो हम से ज़माना याद आता है
बदल कर वज़ा छुप कर शब को आना याद आता है
वो बातें भोली और वो शोख़ी नाज़ ओ ग़म्जे़ की
वो हँस हँस कर तेरा मुझ को रूलाना याद आता है
गले मे डाल कर बाहें वो लब से लब मिला देना
फिर अपने हाथ से साग़र पिलाना याद आता है
बदलना करवट और तकिया मेरे पहलू में रख देना
वो सोना आप और मेरा जगाना याद आता है
वो सीधी उल्टी इक इक मुँह में सौ सौ मुझ को कह जाना
दम-ए-बोसा वो तेरा रूठ जाना याद आता है
तसल्ली को दिल-ए-बेताब की मेरी दम-ए-रूख़्सत
नई कसमें वो झूटी झूटी खाना याद आता है
वो रश्क-ए-ग़ैर पर रो रो के हिचकी मेरी बाँध जाना
फ़रेबों से वो तेरा शक मिटाना याद आता है
वो मेरा चौंक चौंक उठना सहर के ग़म से और तेरा
लगा कर अपने सीना से सुलाना याद आता है
कभी कुछ कह के वो मुझ को रूलाना उस सितम-गर का
फिर आँखें नीची कर के मुस्कुराना याद आता है
छेड़ मंजूर है क्या आशिक-ए-दिल-गीर के साथ, ched manjur hai kya ashiq a dil gir
छेड़ मंजूर है क्या आशिक-ए-दिल-गीर के साथ
ख़त भी आया कभी तो ग़ैर की तहरीर के साथ
गो के इकरार ग़लत था मगर इक थी तस्कीन
अब तो इंकार है कुछ और ही त़करीर के साथ
पेच क़िस्मत का हो तो क्या करे इस में कोई
दिल को वाबस्तगी है ज़ुल्फ-ए-गिरह-गीर के साथ
वो भी कहते हुए कुछ दूर तक आए पीछे
हम जो उस बज़्म से निकले भी तौ तौक़ीर के साथ
ये भी इक वस्ल की सूरत थी मगर रश्क-ए-नसीब
उस की तस्वीर कभी ग़ैर की तस्वीर के साथ
वादा-ए-सुब्ह पे अब किस को यकीं हो क़ासिद
आज तो जान गई नाला-ए-शब-गीर के साथ
कहो रंजिश का सबब कुछ नहीं मेरी ही सुनो
उज्र तो चाहिए करना मुझे तक़्सीर के साथ
आप देते हैं अज़ीयत ही शिकायत की एवज़
कुछ ज़बाँ से भी तो फरमाइए ताज़ीर के साथ
देखिए मिल ही गया आप से वो शोख़ ‘निज़ाम’
काम जो कुछ करे इंसान सौ तदबीर के साथ
अँगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ Angdai bhi vo lene na paaye utha ke hath
अँगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ
देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गई
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
ये भी नया सितम है हिना तो लगाएँ ग़ैर
और उस की दाद चाहें वो मुझ को दिखा के हाथ
बे-इख़्तियार हो के जो मैं पाँव पर गिरा
ठोड़ी के निचे उस ने धरा मुस्कुरा के हाथ
गर दिल को बस में पाएँ तो नासेह तेरी सुनें
अपनी तो मर्ग ओ ज़ीस्त है उस बे-वफ़ा के हाथ
वो जानुओं में सीना छुपाना सिमट के हाए
और फिर सँभालना वो दुपट्टा छुड़ा के हाथ
ऐ दिल कुछ और बात की रग़बत न दे मुझे
सुननी पडेंगी सैंकड़ों उस को लगा के हाथ
वो कुछ किसी का कह के सताना सदा मुझे
वो खींच लेना पर्दे से अपना दिखा के हाथ
देखा जो कुछ रूका मुझे तो किसी तपाक से
गर्दन में मेरी डाल दिए आप आ के हाथ
फिर क्यूँ न चाक हो जो हैं ज़ोर-आज़माइयाँ
बाँधूंगा फिर दुपट्टा से उस बे-ख़ता के हाथ
कूचे से तेरे उट्ठें तो फिर जाएँ हम कहाँ
बैठे हैं याँ तो दोनों जहाँ से उठा के हाथ
पहचाना फिर तो क्या ही निदामत हुई उन्हें
पंडित समझ के मुझ को और अपना दिखा के हाथ
देना वो उस का साग़र-ए-मय याद है ‘निज़ाम’
मुँह फेर कर उधर को इधर को बढ़ा के हाथ