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Thursday, 27 December 2018
रेंग रहे हैं साये अब वीराने में धूप उतर आई कैसे तहख़ाने में
रेंग रहे हैं साये अब वीराने में
धूप उतर आई कैसे तहख़ाने में
जाने कब तक गहराई में डूबूँगा
तैर रहा है अक्स कोई पैमाने में
उस मोती को दरिया में फेंक आया हूँ
मैं ने सब कुछ खोया जिसको पाने में
हम प्यासे हैं ख़ुद अपनी कोताही से
देर लगाई हम ने हाथ बढ़ाने में
क्या अपना हक़ है हमको मालूम नहीं
उम्र गुज़ारी हम ने फ़र्ज़ निभाने में
वो मुझ को आवारा कहकर हँसते हैं
मैं भटका हूँ जिनको राह पे लाने में
कब समझेगा मेरे दिल का चारागर
वक़्त लगेगा ज़ख्मों को भर जाने में
हँस कर कोई ज़ह्र नहीं पीता आलम
किस को अच्छा लगता है मर जाने में
धूप उतर आई कैसे तहख़ाने में
जाने कब तक गहराई में डूबूँगा
तैर रहा है अक्स कोई पैमाने में
उस मोती को दरिया में फेंक आया हूँ
मैं ने सब कुछ खोया जिसको पाने में
हम प्यासे हैं ख़ुद अपनी कोताही से
देर लगाई हम ने हाथ बढ़ाने में
क्या अपना हक़ है हमको मालूम नहीं
उम्र गुज़ारी हम ने फ़र्ज़ निभाने में
वो मुझ को आवारा कहकर हँसते हैं
मैं भटका हूँ जिनको राह पे लाने में
कब समझेगा मेरे दिल का चारागर
वक़्त लगेगा ज़ख्मों को भर जाने में
हँस कर कोई ज़ह्र नहीं पीता आलम
किस को अच्छा लगता है मर जाने में
रंग-बिरंगे ख़्वाबों के असबाब कहाँ रखते हैं हम
रंग-बिरंगे ख़्वाबों के असबाब कहाँ रखते हैं हम
अपनी आँखों में कोई महताब कहाँ रखते हैं हम
यह अपनी ज़रखेज़ी है जो खिल जाते हैं फूल नए
वरना अपनी मिटटी को शादाब कहाँ रखते हैं हम
हम जैसों कि नाकामी पर क्यों हैरत है दुनिया को
हर मौसम में जीने के आदाब कहाँ रखते हैं हम
महरूमी ने ख़्वाबों में भी हिज्र के काँटे बोए हैं
उस का पैकर मर्मर का किम्ख्वाब कहाँ रखते हैं हम
तेज़ हवा के साथ उड़े हैं जो अवराक़ सुनहरे थे
अब क़िस्से में दिलचस्पी का बाब कहाँ रखते हैं हम
सुब्ह सवेरे आँगन अपना गूँज उठे चहकारों से
तोता, मैना, बुलबुल या सुर्खाब कहाँ रखते हैं हम
अपनी आँखों में कोई महताब कहाँ रखते हैं हम
यह अपनी ज़रखेज़ी है जो खिल जाते हैं फूल नए
वरना अपनी मिटटी को शादाब कहाँ रखते हैं हम
हम जैसों कि नाकामी पर क्यों हैरत है दुनिया को
हर मौसम में जीने के आदाब कहाँ रखते हैं हम
महरूमी ने ख़्वाबों में भी हिज्र के काँटे बोए हैं
उस का पैकर मर्मर का किम्ख्वाब कहाँ रखते हैं हम
तेज़ हवा के साथ उड़े हैं जो अवराक़ सुनहरे थे
अब क़िस्से में दिलचस्पी का बाब कहाँ रखते हैं हम
सुब्ह सवेरे आँगन अपना गूँज उठे चहकारों से
तोता, मैना, बुलबुल या सुर्खाब कहाँ रखते हैं हम
रंग बिरंगे सपने रोज़ दिखा जाता है क्यों
रंग बिरंगे सपने रोज़ दिखा जाता है क्यों
बैरी चाँद हमारी छत पर आ जाता है क्यों
क्या रिश्ता है आखिर मेरा एक सितारे से
रोज़ वो कोई राज़ मुझे बतला जाता है क्यों
पलकें बंद करूं तो सब कुछ अच्छा लगता है
आँखें खोलूँ तो कोहरा सा छा जाता है क्यों
हर पैकर का अपना अपना साया होता है
लेकिन साये को साया ही खा जाता है क्यों
मेरे हिस्से की किरणें जब कोई चुराता है
नील गगन पर सूरज वो शरमा जाता है क्यों
शायद उसके दिल में कोई चोर समाया है
देख के मुझको यार मेरा घबरा जाता है क्यों
बैरी चाँद हमारी छत पर आ जाता है क्यों
क्या रिश्ता है आखिर मेरा एक सितारे से
रोज़ वो कोई राज़ मुझे बतला जाता है क्यों
पलकें बंद करूं तो सब कुछ अच्छा लगता है
आँखें खोलूँ तो कोहरा सा छा जाता है क्यों
हर पैकर का अपना अपना साया होता है
लेकिन साये को साया ही खा जाता है क्यों
मेरे हिस्से की किरणें जब कोई चुराता है
नील गगन पर सूरज वो शरमा जाता है क्यों
शायद उसके दिल में कोई चोर समाया है
देख के मुझको यार मेरा घबरा जाता है क्यों
ये सोचा नहीं है किधर जाएँगे
ये सोचा नहीं है किधर जाएँगे
मगर हम यहाँ से गुज़र जाएँगे
इसी खौफ से नींद आती नहीं
कि हम ख्वाब देखेंगे डर जाएँग
डराता बहुत है समन्दर हमें
समन्दर में इक दिन उतर जाएँगे
जो रोकेगी रस्ता कभी मंज़िलें
घड़ी दो घड़ी को ठहर जाएँगे
कहाँ देर तक रात ठहरी कोई
किसी तरह ये दिन गुज़र जाएँगे
इसी खुशगुमानी ने तनहा किया
जिधर जाऊँगा, हमसफ़र जाएँगे
बदलता है सब कुछ तो 'आलम' कभी
ज़मीं पर सितारे बिखर जाएँगे
मगर हम यहाँ से गुज़र जाएँगे
इसी खौफ से नींद आती नहीं
कि हम ख्वाब देखेंगे डर जाएँग
डराता बहुत है समन्दर हमें
समन्दर में इक दिन उतर जाएँगे
जो रोकेगी रस्ता कभी मंज़िलें
घड़ी दो घड़ी को ठहर जाएँगे
कहाँ देर तक रात ठहरी कोई
किसी तरह ये दिन गुज़र जाएँगे
इसी खुशगुमानी ने तनहा किया
जिधर जाऊँगा, हमसफ़र जाएँगे
बदलता है सब कुछ तो 'आलम' कभी
ज़मीं पर सितारे बिखर जाएँगे
याद आता हूँ तुम्हें सूरज निकल जाने के बाद
याद आता हूँ तुम्हें सूरज निकल जाने के बाद
इक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बाद
मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यों देखता हूँ आसमां
यह ख्याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद
दोस्तों के साथ चलने में भी हैं खतरे हज़ार
भूल जाता हूँ हमेशा मैं संभल जाने के बाद
फासला भी कुछ ज़रूरी है चरागाँ करते वक्त
तजरबा ये हाथ आया , हाथ जल जाने के बाद
एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम
यह खुला मुझ पर मगर रस्ता बदल जाने के बाद
वहशते-दिल को बयाबां से ताल्लुक है अजीब
कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बाद
आगही ने हम पे नाज़िल कर दिया कैसा अज़ाब
हैरती कोई नहीं मंज़र बदल जाने के बाद
अब हवा ने हुक्म जारी कर दिया बादल के नाम
खूब बरसेंगी घटायें शहर जल जाने के बाद
तोड़ दो 'आलम' कमां या अब क़लम कर लो ये हाथ
लौट कर आते नहीं हैं तीर चल जाने के बाद
इक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बाद
मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यों देखता हूँ आसमां
यह ख्याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद
दोस्तों के साथ चलने में भी हैं खतरे हज़ार
भूल जाता हूँ हमेशा मैं संभल जाने के बाद
फासला भी कुछ ज़रूरी है चरागाँ करते वक्त
तजरबा ये हाथ आया , हाथ जल जाने के बाद
एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम
यह खुला मुझ पर मगर रस्ता बदल जाने के बाद
वहशते-दिल को बयाबां से ताल्लुक है अजीब
कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बाद
आगही ने हम पे नाज़िल कर दिया कैसा अज़ाब
हैरती कोई नहीं मंज़र बदल जाने के बाद
अब हवा ने हुक्म जारी कर दिया बादल के नाम
खूब बरसेंगी घटायें शहर जल जाने के बाद
तोड़ दो 'आलम' कमां या अब क़लम कर लो ये हाथ
लौट कर आते नहीं हैं तीर चल जाने के बाद
मिल के रहने की ज़रूरत ही भुला दी गई क्या
मिल के रहने की ज़रूरत ही भुला दी गई क्या
याँ मुहब्बत की रिवायत थी मिटा दी गई क्या
बेनिशाँ कब के हुए सारे पुराने नक़शे
और बेहतर कोई तस्वीर बना दी गई क्या
अब के दरिया में नज़र आती है सुर्ख़ी कैसी
बहते पानी में कोई चीज़ मिला दी गई क्या
एक बन्दे की हुकूमत है ख़ुदाई सारी
सारी दुनिया में मुनादी ये करा दी गई क्या
मुँह उठाए चले आते हैं अन्धेरों के सफ़ीर
वो जो इक रस्म-ए-चिरागाँ थी उठा दी गई क्या
मैं अन्धेरों में भटकता हूँ तो हैरत कैसी
मेरे रस्ते में कोई शम्मा जला दी गई क्या
याँ मुहब्बत की रिवायत थी मिटा दी गई क्या
बेनिशाँ कब के हुए सारे पुराने नक़शे
और बेहतर कोई तस्वीर बना दी गई क्या
अब के दरिया में नज़र आती है सुर्ख़ी कैसी
बहते पानी में कोई चीज़ मिला दी गई क्या
एक बन्दे की हुकूमत है ख़ुदाई सारी
सारी दुनिया में मुनादी ये करा दी गई क्या
मुँह उठाए चले आते हैं अन्धेरों के सफ़ीर
वो जो इक रस्म-ए-चिरागाँ थी उठा दी गई क्या
मैं अन्धेरों में भटकता हूँ तो हैरत कैसी
मेरे रस्ते में कोई शम्मा जला दी गई क्या
बीच भँवर में पहले उतारा जाता है
बीच भँवर में पहले उतारा जाता है
फिर साहिल से हमें पुकारा जाता है
ख़ुश हैं यार हमारी सादालौही पर
हम ख़ुश हैं क्या इसमें हमारा जाता है
पहले भी वो चाँद हमारा साथी था
देखें! कितनी दूर सितारा जाता है
कब तक अपनी पलकें बंद रखोगे तुम
क्या आँखों से कोई नज़ारा जाता है
दुनिया की आदत है इसमें हैरत क्या
काँच के घर पर पत्थर मारा जाता है
कब आएगा तेरा सुनहरा कल आलम
इस चक्कर में आज हमारा जाता है
फिर साहिल से हमें पुकारा जाता है
ख़ुश हैं यार हमारी सादालौही पर
हम ख़ुश हैं क्या इसमें हमारा जाता है
पहले भी वो चाँद हमारा साथी था
देखें! कितनी दूर सितारा जाता है
कब तक अपनी पलकें बंद रखोगे तुम
क्या आँखों से कोई नज़ारा जाता है
दुनिया की आदत है इसमें हैरत क्या
काँच के घर पर पत्थर मारा जाता है
कब आएगा तेरा सुनहरा कल आलम
इस चक्कर में आज हमारा जाता है
बह रहा था एक दरिया ख़्वाब में
बह रहा था एक दरिया ख़्वाब में
रह गया मैं फिर भी प्यासा ख़्वाब में
जी रहा हूँ और दुनिया में मगर
देखता हूँ और दुनिया ख़्वाब में
रोज़ आता है मेरा ग़म बाँटने
आसमाँ से इक सितारा ख़्वाब में
इस जमीं पर तो नज़र आता नहीं
बस गया है जो सरापा ख़्वाब में
मुद्दतों से दिल है उसका मुन्तजीर
कोई वादा कर गया था ख़्वाब में
एक बस्ती है जहाँ खुश हैं सभी
देख लेता हूँ मैं क्या-क्या ख़्वाब में
असल दुनिया में तमाशे कम हैं क्या
क्यों नजर आये तमाशा ख़्वाब में
खोल कर आँखें पशेमा हूँ बहुत
खो गया जो कुछ मिला था ख़्वाब में
रह गया मैं फिर भी प्यासा ख़्वाब में
जी रहा हूँ और दुनिया में मगर
देखता हूँ और दुनिया ख़्वाब में
रोज़ आता है मेरा ग़म बाँटने
आसमाँ से इक सितारा ख़्वाब में
इस जमीं पर तो नज़र आता नहीं
बस गया है जो सरापा ख़्वाब में
मुद्दतों से दिल है उसका मुन्तजीर
कोई वादा कर गया था ख़्वाब में
एक बस्ती है जहाँ खुश हैं सभी
देख लेता हूँ मैं क्या-क्या ख़्वाब में
असल दुनिया में तमाशे कम हैं क्या
क्यों नजर आये तमाशा ख़्वाब में
खोल कर आँखें पशेमा हूँ बहुत
खो गया जो कुछ मिला था ख़्वाब में
नींद पलकों में धरी रहती थी
नींद पलकों में धरी रहती थी
जब ख़यालों में परी रहती थी
ख़्वाब जब तक थे मेरी आंखों में
शाख़े- उम्मीद हरी रहती थी
एक दरिया था तेरी यादों का
दिल के सेहरा में तरी रहती थी
कोई चिड़िया थी मेरे अंदर भी
जो हर इक ग़म से बरी रहती थी
हैरती अब हैं सभी पैमाने
ये सुराही तो भरी रहती थी
कितने पैबन्द नज़र आते हैं
जिन लिबासों में ज़री रहती थी
एक आलम था मेरे क़दमों में
पास जादू की दरी रहती थी
जब ख़यालों में परी रहती थी
ख़्वाब जब तक थे मेरी आंखों में
शाख़े- उम्मीद हरी रहती थी
एक दरिया था तेरी यादों का
दिल के सेहरा में तरी रहती थी
कोई चिड़िया थी मेरे अंदर भी
जो हर इक ग़म से बरी रहती थी
हैरती अब हैं सभी पैमाने
ये सुराही तो भरी रहती थी
कितने पैबन्द नज़र आते हैं
जिन लिबासों में ज़री रहती थी
एक आलम था मेरे क़दमों में
पास जादू की दरी रहती थी
देख रहा है दरिया भी हैरानी से
देख रहा है दरिया भी हैरानी से
मैं ने कैसे पार किया आसानी से
नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ
कुछ रिश्ता है मेरा बहते पानी से
हर कमरे से धूप, हवा की यारी थी
घर का नक्शा बिगड़ा है मनमानी से
अब जंगल में चैन से सोया करता हूँ
डर लगता था बचपन में वीरानी से
दिल पागल है रोज़ पशीमाँ होता है
फिर भी बाज़ नहीं आता मनमानी से
अपना फ़र्ज़ निभाना एक इबादत है
आलम हम ने सीखा इक जापानी से
मैं ने कैसे पार किया आसानी से
नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ
कुछ रिश्ता है मेरा बहते पानी से
हर कमरे से धूप, हवा की यारी थी
घर का नक्शा बिगड़ा है मनमानी से
अब जंगल में चैन से सोया करता हूँ
डर लगता था बचपन में वीरानी से
दिल पागल है रोज़ पशीमाँ होता है
फिर भी बाज़ नहीं आता मनमानी से
अपना फ़र्ज़ निभाना एक इबादत है
आलम हम ने सीखा इक जापानी से
दरियाओं पर अब्र बरसते रहते हैं
दरियाओं पर अब्र बरसते रहते हैं
और हमारे खेत तरसते रहते हैं
अपना ही वीरानी से कुछ रिश्ता है
वरना दिल भी उजड़ते बसते रहते हैं
उनको भी पहचान बनानी है अपनी
औरों पर आवाज़ें कसते रहते हैं
बच्चे कैसे उछलें, कूदें, जस्त भरें
उन की पीठ पे भारी बसते रहते हैं
उनके दिल में झाँकें इक दिन हम आलम
जिन के हाथों में गुलदस्ते रहते हैं
और हमारे खेत तरसते रहते हैं
अपना ही वीरानी से कुछ रिश्ता है
वरना दिल भी उजड़ते बसते रहते हैं
उनको भी पहचान बनानी है अपनी
औरों पर आवाज़ें कसते रहते हैं
बच्चे कैसे उछलें, कूदें, जस्त भरें
उन की पीठ पे भारी बसते रहते हैं
उनके दिल में झाँकें इक दिन हम आलम
जिन के हाथों में गुलदस्ते रहते हैं
दरवाज़े पर दस्तक देते डर लगता है
दरवाज़े पर दस्तक देते डर लगता है
सहमा-सहमा-सा अब मेरा घर लगता है
साज़िश होती रहती है दीवार ओ दर में
घर से अच्छा अब मुझको बाहर लगता है
झुक कर चलने की आदत पड़ जाए शायद
सर जो उठाऊँ दरवाज़े में सर लगता है
क्यों हर बार निशाना मैं ही बन जाता हूँ
क्यों हर पत्थर मेरे ही सर पर लगता है
ज़िक्र करूँ क्या उस की ज़ुल्म ओ तशद्दुद का मैं
फूल भी जिसके हाथों में पत्थर लगता है
लौट के आया हूँ मैं तपते सहराओं से
शबनम का क़तरा मुझको सागर लगता है
ठीक नहीं है इतना अच्छा बन जाना भी
जिस को देखूँ वो मुझ से बेहतर लगता है
इक मुद्दत पर आलम बाग़ में आया हूँ मैं
बदला-बदला-सा हर इक मंज़र लगता है
सहमा-सहमा-सा अब मेरा घर लगता है
साज़िश होती रहती है दीवार ओ दर में
घर से अच्छा अब मुझको बाहर लगता है
झुक कर चलने की आदत पड़ जाए शायद
सर जो उठाऊँ दरवाज़े में सर लगता है
क्यों हर बार निशाना मैं ही बन जाता हूँ
क्यों हर पत्थर मेरे ही सर पर लगता है
ज़िक्र करूँ क्या उस की ज़ुल्म ओ तशद्दुद का मैं
फूल भी जिसके हाथों में पत्थर लगता है
लौट के आया हूँ मैं तपते सहराओं से
शबनम का क़तरा मुझको सागर लगता है
ठीक नहीं है इतना अच्छा बन जाना भी
जिस को देखूँ वो मुझ से बेहतर लगता है
इक मुद्दत पर आलम बाग़ में आया हूँ मैं
बदला-बदला-सा हर इक मंज़र लगता है
थपक-थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं
थपक-थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं
वो ख्वाब हम को हमेशा जगाते रहते हैं
उम्मीदें जागती रहती हैं, सोती रहती हैं
दरीचे शम्मा जलाते-बुझाते रहते हैं
न जाने किस का हमें इन्तिज़ार रहता है
कि बाम ओ दर को हमेशा सजाते रहते हैं
किसी को खोजते हैं हम किसी के पैकर में
किसी का चेहरा किसी से मिलाते रहते हैं
वो नक़्शे ख्वाब मुकम्मल कभी नहीं होता
तमाम उम्र जिसे हम बनाते रहते हैं
उसी का अक्स हर इक रंग में झळकता है
वो एक दर्द जिसे हम छुपाते रहते हैं
हमें खबर है दोबारा कभी न आएंगे
गए दिनों को मगर हम बुलाते रहते हैं
ये खेल सिर्फ तुम्हीं खेलते नहीं आलम
सभी हवा में लकीरे बनाते रहते हैं
वो ख्वाब हम को हमेशा जगाते रहते हैं
उम्मीदें जागती रहती हैं, सोती रहती हैं
दरीचे शम्मा जलाते-बुझाते रहते हैं
न जाने किस का हमें इन्तिज़ार रहता है
कि बाम ओ दर को हमेशा सजाते रहते हैं
किसी को खोजते हैं हम किसी के पैकर में
किसी का चेहरा किसी से मिलाते रहते हैं
वो नक़्शे ख्वाब मुकम्मल कभी नहीं होता
तमाम उम्र जिसे हम बनाते रहते हैं
उसी का अक्स हर इक रंग में झळकता है
वो एक दर्द जिसे हम छुपाते रहते हैं
हमें खबर है दोबारा कभी न आएंगे
गए दिनों को मगर हम बुलाते रहते हैं
ये खेल सिर्फ तुम्हीं खेलते नहीं आलम
सभी हवा में लकीरे बनाते रहते हैं
तोड़ के इसको वर्षो रोना होता है
तोड़ के इसको वर्षो रोना होता है
दिल शीशे का एक खिलौना होता है
महफ़िल में सब हँसते-गाते रहते है
तन्हाई में रोना-धोना होता है
कोई जहाँ से रोज़ पुकारा करता है
हर दिल में इक ऐसा कोना होता है
बेमतलब कि चालाकी हम करते हैं
हो जाता है जो भी होना होता है
दुनिया हासिल करने वालों से पूछो
इस चक्कर में क्या-क्या खोना होता है
सुनता हूँ उनको भी नींद नहीं आती
जिनके घर में चांदी-सोना होता है
खुद ही अपनी शाखें काट रहे हैं हम
क्या बस्ती में जादू-टोना होता है
काँटे-वाँटे चुभते रहते हैं आलम
लेकिन हम को फूल पिरोना होता है
दिल शीशे का एक खिलौना होता है
महफ़िल में सब हँसते-गाते रहते है
तन्हाई में रोना-धोना होता है
कोई जहाँ से रोज़ पुकारा करता है
हर दिल में इक ऐसा कोना होता है
बेमतलब कि चालाकी हम करते हैं
हो जाता है जो भी होना होता है
दुनिया हासिल करने वालों से पूछो
इस चक्कर में क्या-क्या खोना होता है
सुनता हूँ उनको भी नींद नहीं आती
जिनके घर में चांदी-सोना होता है
खुद ही अपनी शाखें काट रहे हैं हम
क्या बस्ती में जादू-टोना होता है
काँटे-वाँटे चुभते रहते हैं आलम
लेकिन हम को फूल पिरोना होता है
जिस कि दूरी वज्हे-ग़म हो जाती है
जिस कि दूरी वज्हे-ग़म हो जाती है
पास आकर वो ग़ैर अहम हो जाती है
मैं शबनम का क़िस्सा लिखता रहता हूँ
और काग़ज़ पर धूप रक़म हो जाती है
आन बसा है सेहरा मेरी आँखों में
दिल की मिट्टी कैसे नम हो जाती है
जिसने इस को ठुकराने की जुर्रत की
दुनिया उसके आगे ख़म हो जाती है
ऊँचे सुर में हम भी गाया करते थे
रफ़्ता रफ़्ता लय मद्धम हो जाती है
मैं जितनी रफ़्तार बढ़ाता हूँ आलम
मंज़िल उतनी तेज़ क़दम हो जाती है
पास आकर वो ग़ैर अहम हो जाती है
मैं शबनम का क़िस्सा लिखता रहता हूँ
और काग़ज़ पर धूप रक़म हो जाती है
आन बसा है सेहरा मेरी आँखों में
दिल की मिट्टी कैसे नम हो जाती है
जिसने इस को ठुकराने की जुर्रत की
दुनिया उसके आगे ख़म हो जाती है
ऊँचे सुर में हम भी गाया करते थे
रफ़्ता रफ़्ता लय मद्धम हो जाती है
मैं जितनी रफ़्तार बढ़ाता हूँ आलम
मंज़िल उतनी तेज़ क़दम हो जाती है
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