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Tuesday, 27 November 2018

बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं

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बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं 

एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं 

दर्द अगर ये है तो मुझे बस है 
अब दवा की कुछ एहतेयाज नहीं 

हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन
मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं 

शहर-ए-ख़ूबाँ को ख़ूब देखा मीर
जिंस-ए-दिल का कहीं रिवाज नहीं


नहीं विश्वास जी गँवाने के हाय रे ज़ौक़ दिल लगाने के

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नहीं विश्वास जी गँवाने के 

हाय रे ज़ौक़ दिल लगाने के

मेरे तग़यीर-ए-हाल पर मत जा
इत्तेफ़ाक़ात हैं ज़माने के

दम-ए-आखिर ही क्या न आना था 
और भी वक़्त थे बहाने के 

इस कदूरत को हम समझते हैं 
ढब हैं ये ख़ाक में मिलाने के

दिल-ओ-दीं, होश-ओ-सब्र, सब ही गए 
आगे-आगे तुम्हारे आने के


मसाइब और थे पर दिल का जाना

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मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है 
सरहाने मीर के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है

उम्र भर हम रहे शराबी से

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उम्र भर हम रहे शराबी से 
दिल-ए-पुर्खूं की इक गुलाबी से
खिलना कम-कम कली ने सीखा है
उसकी आँखों की नीम ख़्वाबी से 
काम थे इश्क़ में बहुत ऐ मीर 
हम ही फ़ारिग़ हुए शताबी से

नाला जब गर्मकार होता है

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नाला जब गर्मकार होता है 
दिल कलेजे के पार होता है 
सब मज़े दरकिनार आलम के 
यार जब हमकिनार होता है 
जब्र है, क़ह्र है, क़यामत है 
दिल जो बेइख़तियार होता है

यही इश्क़ ही जी खपा जानता है

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यही इश्क़ ही जी खपा जानता है 
कि जानाँ से भी दिल मिला जानता है 
मेरा शे'र अच्छा भी दानिस्ता ज़िद से 
किसी और ही का कहा जानता है
ज़माने के अक्सर सितम्गार देखे 
वही ख़ूब तर्ज़-ए-जफ़ा जानता है

हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ, ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।

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हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ,
ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।
नाजां हो उसके सामने क्या गुल खिला हुआ,
रखता है लुत्फे-नाज भी रू-ए-निकू के साथ।
हंगामे जैसे रहते हैं उस कूचे में सदा,
जाहिर है हश्र होगी ऐसी गलू के साथ।
मजरूह अपनी छाती को बखिया किया बहुत,
सीना गठा है 'मीर' हमारा रफू के साथ.

इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ उस से आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ

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इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
उस से आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ
बेकली दिल ही की तमाशा है
बर्क़ में ऐसे इज़्तेराब कहाँ
हस्ती अपनी है बीच में पर्दा
हम न होवें तो फिर हिजाब कहाँ
गिरिया-ए-शब से सुर्ख़ हैं आँखें
मुझ बला नोश को शराब कहाँ
इश्क़ है आशिक़ों को जलने को
ये जहन्नुम में है अज़ाब कहाँ
महव हैं इस किताबी चेहरे के
आशिक़ों को सर-ए-किताब कहाँ
इश्क़ का घर है 'मीर' से आबाद
ऐसे फिर ख़ानमाँख़राब कहाँ

अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब

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अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
मुझ दिल-जले को नींद न आई तमाम शब
 
चमक चली गई थी सितारों की सुबह तक, 
की आस्माँ से दीदा-बराई तमाम शब। 

जब मैंने शुरू क़िस्सा किया आँखें खोल दीं, 
यक़ीनी थी मुझ को चश्म-नुमाई तमाम शब
 
वक़्त-ए-सियाह ने देर में कल यावरी- सी की, 
थी दुश्मनों से इन की लड़ाई तमाम शब
 
तारे से तेरी पलकों पे क़तरे अश्क के, 
दे रहे हैं "मीर" दिखाई तमाम शब

रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी

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रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
न इस दयार में समझा कोई ज़बाँ मेरी
बरंग-ए-सौत-ए-जरस तुझ से दूर हूँ तनहा
ख़बर नहीं है तुझे आह कारवाँ मेरी
उसी से दूर रहा अस्ल-ए-मुद्दा जो था
गई ये उम्र-ए-अज़ीज़ आह रायगाँ मेरी
तेरे फ़िराक़ में जैसे ख़याल मुफ़्लिस का
गई है फ़िक्र-ए-परेशाँ कहाँ कहाँ मेरी
दिया दिखाई मुझे तो उसी का जल्वा "मीर"
पड़ी जहाँ में जा कर नज़र जहाँ मेरी

आरज़ूएं हज़ार रखते हैं तो भी हम दिल को मार रखते हैं

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आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
तो भी हम दिल को मार रखते हैं

बर्क़ कम हौसला है, हम भी तो
दिलक एे बेक़रार रखते हैं

ग़ैर है मौरीद ए इनायत हाये
हम भी तो तुझ से प्यार रखते हैं

न निगह ने पयाम ने वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं

हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो
लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं

चोटटे दिल की हैं बुतां मशहूर
बस, यही एतबार रखते हैं

फिर भी करते हैं 'मीर' साहब इश्क़
हैं जवाँ, इख़्तियार रखते

दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया झँकना ताकना कभु न गया

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दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
झँकना ताकना कभु न गया
हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया
सब गये होश-ओ-सब्र-ओ-ताब-ओ-तवाँ
लेकिन ऐ दाग़ दिल से तु न गया
हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उन को देखा तो ख़ुदा याद आ गया
दिल में कितने मसौदे थे वले
एक पेश उस के रू-ब-रू न गया
सुबाह गर्दान ही 'मीर' हम तो रहे
दस्त-ए-कोताह ता सबू न गया

यारो मुझे मु'आफ़ रखो मैं नशे में हूँ अब दो तो जाम खाली ही दो मैं नशे में हूँ

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यारो मुझे मु'आफ़ रखो मैं नशे में हूँ
अब दो तो जाम खाली ही दो मैं नशे में हूँ

माज़ूर हूँ जो पाओं मेरा बेतरह पड़े
तुम सर-गराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में हूँ

या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय
या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ

मस्ती से दरहमी है मेरी गुफ्तगू के बीच
जो चाहो तुम भी मुझको को कहो में नशे में हूँ

नाजुक मिजाज आप क़यामत है मीर जी 
ज्यों शीशा मेरे मुंह न लगो में नशे में हूँ

दुश्मनी हमसे की ज़माने ने जो जफ़ाकार तुझसा यार किया

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दुश्मनी हमसे की ज़माने ने
जो जफ़ाकार तुझसा यार किया

ये तवाहुम का कारख़ाना है
याँ वही है जो ऐतबार किया

हम फ़क़ीरों से बे-अदाई क्या
आन बैठे जो तुमने प्यार किया

सद रग-ए-जाँ को ताब दे बाहम
तेरी ज़ुल्फ़ों का एक तार किया

सख़त काफ़िर था जिसने पहले "मीर"
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया

चलते हो तो चमन को चलिये कहतए हैं कि बहाराँ है

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चलते हो तो चमन को चलिये
कहतए हैं कि बहाराँ है
पात हरे हैं फूल खिले हैं
कम कम बाद-ओ-बाराँ है
आगे मैख़ाने को निकलो
अहद-ए-बादा गुज़ाराँ है
लोहु-पानी एक करे ये
इश्क़-ए-लालाअज़ाराँ है
इश्क़ में हमको "मीर" निहायत
पास-ए-इज़्ज़त-दाताँ है

शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत

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शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
मर्सिये ने दिल को मेरे भी रुलाया है बहुत

वादी-ओ-कोहसर में रोता हूँ धाड़े मार-मार
दिलबरान-ए-शहर ने मुझ को सताया है बहुत

वा नहीं होता किसी से दिल गिरिफ़्ता इश्क़ का
ज़ाहिरा ग़म-गीं उसे रहना ख़ुश आया है बहुत

अब जो इक हसरत-ए-जवानी है उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है।

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अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है।
ख़ाक थी मौजज़न जहाँ में, और
हम को धोखा ये था के पानी है।
गिरिया हर वक़्त का नहीं बेहेच
दिल में कोई ग़म-ए-निहानी है।
हम क़फ़स ज़ाद क़ैदी हैं वरना
ता चमन परफ़शानी है।
याँ हुये 'मीर' हम बराबर-ए-ख़ाक
वाँ वही नाज़-ओ-सर्गिरानी है।

शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का

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शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का
अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का

दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को
याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का

हर सुबह मेरे सर पर इक हादिसा नया है
पैवंद हो ज़मीं का, शेवा इस आसमाँ का

कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज्मा की कुछ न पूछो
अहवाल क्या कहूँ मैं, इस मज्लिस-ए-रवाँ का

या रोये, या रुलाये, अपनी तो यूँ ही गुज़री
क्या ज़िक्र हम सफ़ीरान याराँ-ए-शादमाँ का

क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालिगी की
गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ाख़वाँ का

पूछो तो 'मीर' से क्या कोई नज़र पड़ा है
चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का

यार बिन तल्ख़ जिंदगानी थी दोस्ती मुद्दई-ए-जानी थी

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यार बिन तल्ख़ जिंदगानी थी
दोस्ती मुद्दई-ए-जानी थी
शेब में फ़ायदा त'म्मुल का
सोचना तब था जब जवानी थी
मेरे क़िस्से से सब की नींदें गईं
कुछ अजब तौर की कहानी थी
कू-ए-क़ातिल से बच के निकला ख़िज़्र
इसी में उस की ज़िंदगनी थी
फ़ित्र पर भी था 'मीर' के इक रंग
कफ़नी पहनी तो ज़ाफ़रानी थी

मीर' दरिया है, सुने शेर ज़बानी उस की

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'मीर' दरिया है, सुने शेर ज़बानी उस की
अल्लाह अल्लाह रे तबियत की रवानी उस की

मिंह तो बोछाड़ का देखा है बरसते तुमने
इसी अंदाज़ से थी अश्क-फ़िशानी उस की

बात की तर्ज़ को देखो तो कोई जदू था
पर मिली ख़ाक में सब सहर बयानी उस की

मर्सि-ए-दिल के कई कह के दिये लोगों ने
शहर-ए-दिल्ली में है सब पास निशानी उस की

अब गये उस के जो अफ़सोस नहीं कुछ हासिल
हैफ़ सद हैफ़ कि कुछ क़द्र न जानी उस की
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