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Saturday, 29 December 2018
निकहते-गुल बहुत इतराई हुई फिरती है।
निकहते-गुल बहुत इतराई हुई फिरती है।
वोह कहीं खोल भी दें तुर्रये-गेसू अपना।
निकहते-ख़ुल्देबरीं फैल गईं कोसों तक।
वोह नहा कर जो सुखाने लगे गेसू अपना॥
लिल्लाह हम्द! कदूरत नहीं रहने पाती।
मुँह धुला देता है हर सुबह को आँसू अपना॥
गम में परवाना-ये-मरहूम के थमते नहीं अश्क।
शमअ़! ऐ शमअ़! ज़रा देख तो मुँह तू अपना॥
वोह कहीं खोल भी दें तुर्रये-गेसू अपना।
निकहते-ख़ुल्देबरीं फैल गईं कोसों तक।
वोह नहा कर जो सुखाने लगे गेसू अपना॥
लिल्लाह हम्द! कदूरत नहीं रहने पाती।
मुँह धुला देता है हर सुबह को आँसू अपना॥
गम में परवाना-ये-मरहूम के थमते नहीं अश्क।
शमअ़! ऐ शमअ़! ज़रा देख तो मुँह तू अपना॥
वोह जिबह करके यह कहते हैं मेरी लाश
वोह जिबह करके यह कहते हैं मेरी लाश से-।
"तड़प रहा है कि मुँह देखता है तू मेरा॥
कराहने में मुझे उज़्र क्या मगर ऐ दर्द।
गला दबाती है रह-रह के आबरू मेरा॥
कहाँ किसी में यह क़ुदरत सिवाय तेग़े-निगाह।
कि हो नियाम में और काट ले गुलू मेरा॥
"तड़प रहा है कि मुँह देखता है तू मेरा॥
कराहने में मुझे उज़्र क्या मगर ऐ दर्द।
गला दबाती है रह-रह के आबरू मेरा॥
कहाँ किसी में यह क़ुदरत सिवाय तेग़े-निगाह।
कि हो नियाम में और काट ले गुलू मेरा॥
कहाँ है उसका कूचा, कौन है वह
कहाँ है उसका कूचा, कौन है वह? क्या खबर क़ासिद!
पर इतना जानते हैं, नाम है आशिक़नवाज़ उसका॥
न छोडे़ जुस्तजूये-यार ख़िज्रे-शौक से कह दो।
किसी दिन खुद लगा लेगी, पता उम्रेदराज़ उसका॥
अबस शिकवा है मय-सी चीज़ का, वाइज़ है क्यों दुश्मन।
बसीरत जब नहीं, बेशक बजा है अहतराज़ उसका॥
अब इसका ज़िक्र क्या क़ासिद पै जो गुज़री गुज़रने दो।
न कहना इस ख़बर को ‘शाद’ से दिल है गुदाज़ उसका॥
पर इतना जानते हैं, नाम है आशिक़नवाज़ उसका॥
न छोडे़ जुस्तजूये-यार ख़िज्रे-शौक से कह दो।
किसी दिन खुद लगा लेगी, पता उम्रेदराज़ उसका॥
अबस शिकवा है मय-सी चीज़ का, वाइज़ है क्यों दुश्मन।
बसीरत जब नहीं, बेशक बजा है अहतराज़ उसका॥
अब इसका ज़िक्र क्या क़ासिद पै जो गुज़री गुज़रने दो।
न कहना इस ख़बर को ‘शाद’ से दिल है गुदाज़ उसका॥
ऐ शब-ए-ग़म हम हैं और बातें दिल-ए-नाकाम से
ऐ शब-ए-ग़म हम हैं और बातें दिल-ए-नाकाम से
सोते हैं नाम-ए-ख़ुदा सब अपने घर आराम से
जागने वालों पे क्या गुज़री वो जानें क्या भला
सो रहे हैं जा के बिस्तर पर जो अपने शान से
जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गये
कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से
नाला करने के लिये भी ताब-ए-ख़ुश दरकार है
क्या बाताऊँ दिल हटा जाता है क्यों इस काम से
देखते हो मैकदे में मैकशो साक़ी बग़ैर
किस क़िस्म की बेकसी पैदा है शक़्ल-ए-जाम से
सोते हैं नाम-ए-ख़ुदा सब अपने घर आराम से
जागने वालों पे क्या गुज़री वो जानें क्या भला
सो रहे हैं जा के बिस्तर पर जो अपने शान से
जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गये
कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से
नाला करने के लिये भी ताब-ए-ख़ुश दरकार है
क्या बाताऊँ दिल हटा जाता है क्यों इस काम से
देखते हो मैकदे में मैकशो साक़ी बग़ैर
किस क़िस्म की बेकसी पैदा है शक़्ल-ए-जाम से
तमन्नाओं में उलझाया गया हूं
तमन्नाओं में उलझाया गया हूं
खिलौने दे कर बहलाया गया हूं
हूं इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह
इधर से मुद्द्तों आया गया हूं
नहीं उठते क्यों क़दम जानिब-ए-दैर
किसी मस्जिद में बहकाया गया हूं
दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-महफ़िल
मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूं
खिलौने दे कर बहलाया गया हूं
हूं इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह
इधर से मुद्द्तों आया गया हूं
नहीं उठते क्यों क़दम जानिब-ए-दैर
किसी मस्जिद में बहकाया गया हूं
दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-महफ़िल
मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूं
ढूँढोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं, नायाब हैं हम
ढूँढोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं, नायाब हैं हम
ताबीर है जिसकी हसरत-ओ-गम ऐ हमनफ्सों वोः ख्वाब हैं हम
ऐ दर्द पता कुछ तू ही बता अब तक ये मोअम्मा हल न हुआ
हम मैं है दिल-ए-बेताब निहां या आप दिल-ए-बेताब हैं हम
मैं हैरत-ओ-हसरत का मारा खामोश खड़ा हूँ साहिल पर
दरया-ए-मोहब्बत कहता है आ कुछ भी नहीं पायाब हैं हम
लाखों ही मुसाफिर चलते हैं मंजिल पे पोहंचते हैं दो एक
ऐ अहल-इ-ज़माना कद्र करो नायाब न हों कम्याब हैं हम
मुर्गान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ शाद ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुमको आना है ऐसे मैं भी शादाब हैं हम
ताबीर है जिसकी हसरत-ओ-गम ऐ हमनफ्सों वोः ख्वाब हैं हम
ऐ दर्द पता कुछ तू ही बता अब तक ये मोअम्मा हल न हुआ
हम मैं है दिल-ए-बेताब निहां या आप दिल-ए-बेताब हैं हम
मैं हैरत-ओ-हसरत का मारा खामोश खड़ा हूँ साहिल पर
दरया-ए-मोहब्बत कहता है आ कुछ भी नहीं पायाब हैं हम
लाखों ही मुसाफिर चलते हैं मंजिल पे पोहंचते हैं दो एक
ऐ अहल-इ-ज़माना कद्र करो नायाब न हों कम्याब हैं हम
मुर्गान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ शाद ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुमको आना है ऐसे मैं भी शादाब हैं हम
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