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Wednesday, 13 March 2019

ज़ख़्मी हूँ तेरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से jakhmi hu tere naavak ae duj

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ज़ख़्मी हूँ तेरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से
जाने का नहीं चोर मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर से

हम ख़ूब हैं वाक़िफ़ तेरे अंदाज़-ए-कमर से
ये तार निकलता है कोई दिल के गोहर से

फिर आए अगर जीते वो काबे के सफ़र से
तो जानो फिरे शैख़ जी अल्लाह के घर से

सरमाया-ए-उम्मीद है क्या पास हमारे
इक आह है सीने में सो न-उम्मीद असर से

वो ख़ुल्क़ से पेश आते हैं जो फ़ैज़-रसाँ हैं
हैं शाख़-ए-समर-दार में गुल पहले समर से

हाज़िर हैं मेरे जज़्बा-ए-वहशत के जिलो में
बाँधे हुए कोहसार भी दामन को कमर से

लब-रेज़ मय-ए-साफ़ से हों जाम-ए-बिल्लोरीं
ज़मज़म से है मतलब न सफ़ा से न हजर से

अश्कों में बहे जाते हैं हम सू-ए-दर-ए-यार
मक़सूद रह-ए-काबा है दरया के सफ़र से

फ़रयाद-ए-सितम-कश है वो शमशीर-ए-कशीदा
जिस का न रुके वार फ़लक की भी सिपर से

खुलता नहीं दिल बंद ही रहता है हमेशा
क्या जाने के आ जाए है तू उस में किधर से

उफ़ गर्मी-ए-वहशत के मेरी ठोकरों ही में
पत्थर हैं पहाड़ों के उड़े जाते शरर से

कुछ रहमत-ए-बारी से नहीं दूर के साक़ी
रोएँ जो ज़रा मस्त तो मय अब्र से बरसे

मैं कुश्ता हूँ किस चश्म-ए-सियह-मस्त का या रब
टपके है जो मस्ती मेरी तुर्बत के शजर से

नालों के असर से मेरे फोड़ा सा है पकता
क्यूँ रीम सदा निकले न आहन के जिगर से

ऐ 'ज़ौक़' किसी हम-दम-ए-देरीना का मिलना
बेहतर है मुलाक़ात-ए-मसीहा-ओ-ख़िज़र से


ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है ye ikamat hame paigaam-ae-safar

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ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है
ज़िन्दगी मौत के आने की ख़बर देती है

ज़ाल-ए-दुन्या है अजब तरह की अल्लामा-ए-दहर
मर्द-ए-दीं-दार को भी दहरिया कर देती है

बढ़ती जाती है जो मश्क़-ए-सितम उस ज़ालिम की
कुछ मोहब्बत मेरी इस्लाह मगर देती है

फ़ाएदा दे तेरे बीमार को क्या ख़ाक दवा
अब तो इक्सीर भी दीजे तो ज़रर देती है

शम्मा घबरा न शब-ए-ग़म से के कोई दम में
तुझ को काफ़ूर-ए-सफ़ेदी-ए-सहर देती है

ग़ुंचा हँसता है तेरे आगे जो गुस्ताख़ी से
चटखना मुँह पे वहीं बाद-ए-सहर देती है

शम्मा भी कम नहीं कुछ इश्क़ में परवाने से
जान देता है अगर वो तो ये सर देती है

दम-ब-दम ज़ख़्म पे इक ज़ख़्म है दम लेने की
मुझ को फ़ुर्सत नहीं वो तेग़-ए-नज़र देती है

कहते सुनते नहीं कुछ हम तो शब-ए-हिज्र में पर
नाला-ए-दिल का जवाब आह-ए-जिगर देती है

तीरह-बख़्ती मेरी करती है परेशाँ मुझ को
तोहमत इस ज़ुल्फ़-ए-सियाह-फ़ाम पे धर देती है

नख़्ल-ए-मिज़गाँ से है क्या जानिए क्या चश्म-ए-समर
चश्म पानी की जगह ख़ून-ए-जिगर देती है

देती शरबत है किसे ज़हर भरी आँख तेरी
ऐन एहसान है वो ज़हर भी गर देती है

कोई ग़म्माज़ नहीं मेरी तरफ़ से ऐ ‘ज़ौक़’
कान उस के मेरी फ़रयाद ही भर देती है


वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता, vo kon hai jo mujhpar

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वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता
पर मेरा जिगर देख के मैं उफ़ नहीं करता

क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उस के
और दम मेरा जाने में तवक़्क़ुफ़ नहीं करता

कुछ और गुमाँ दिल में न गुज़रे तेरे काफ़िर
दम इस लिए मैं सूर-ए-यूसुफ़ नहीं करता

पढ़ता नहीं ख़त ग़ैर मेरा वाँ किसी उनवाँ
जब तक के वो मज़मूँ में तसर्रुफ़ नहीं करता

दिल फ़क़्र की दौलत से मेरा इतना ग़नी है
दुनिया के ज़र ओ माल पे मैं तुफ़ नहीं करता

ता-साफ़ करे दिल न मय साफ़ से सूफ़ी
कुछ सूद-ए-सफ़ा इल्म-ए-तसव्वुफ़ नहीं करता

ऐ 'ज़ौक' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर
आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता


वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें waqt ae piri shabaab

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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
ऎसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें

फिर मुझे ले चला उधर देखो
दिल-ए-ख़ाना-ख़राब की बातें

वाइज़ा छोड़ ज़िक्र-ए-नेमत-ए-ख़ुल्द
कह शराब ओ कबाब की बातें

मह-जबीं याद हैं के भूल गए
वो शब-ए-माहताब की बातें

हर्फ़ आया जो आबरू पे मेरी
हैं ये चश्म-ए-पुर-आब की बातें

सुनते हैं उस को छेड़ छेड़ के हम
किस मज़े से इताब की बातें

जाम-ए-मय मुँह से तू लगा अपने
छोड़ शर्म ओ हिजाब की बातें

मुझ को रुसवा करेंगी ख़ूब ऐ दिल
ये तेरी इज़्तिराब की बातें

जाओ होता है और भी ख़फ़क़ाँ
सुन के नासेह जनाब की बातें

क़िस्सा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार दिल के लिए
हैं अजब पेच-ओ-ताब की बातें

ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में ऐ ‘ज़ौक़’
हम से हों सब्र ओ ताब की बातें


उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है us sang ae aasta pe jabeen

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उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है
वो अपनी जा-नमाज़ है और ये नमाज़ है

ना-साज़ है जो हम से उसी से ये साज़ है
क्या ख़ूब दिल है वाह हमें जिस पे नाज़ है

पहुँचा है शब कमंद लगा कर वहाँ रक़ीब
सच है हराम-ज़ादे की रस्सी दराज़ है

उस बुत पे गर ख़ुदा भी हो आशिक़ तो आए रश्क
हर-चंद जानता हूँ के वो पाक-बाज़ है

मद्दाह-ए-ख़ाल-ए-रू-ए-बुताँ हूँ मुझे ख़ुदा
बख़्शे तो क्या अजब के वो नुक्ता-नवाज़ है

डरता हूँ ख़ंजर उस का न बह जाए हो के आब
मेरे गले में नाला-ए-आहन-गुदाज़ है

दरवाज़ा मै-कदे का न कर बंद मोहतसिब
ज़ालिम ख़ुदा से डर के दर-ए-तौबा बाज़ है

ख़ाना-ख़राबियाँ दिल-ए-बीमार-ए-ग़म की देख
वो ही दवा ख़राब है जो ख़ाना-साज़ है

शबनम की जा-ए-गुल से टपकती हैं शोख़ियाँ
गुलशन में किस की ख़ाक-ए-शहीदान-ए-नाज़ है

आह ओ फ़ुग़ाँ न कर जो खुले 'ज़ौक़' दिल का हाल
हर नाला इक कलीद-ए-दर-ए-गंज-ए-राज़ है


तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं tere aafat jadaa jin dashto

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तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं
सब्र ओ ताक़त के वहाँ पाँव उखड़ जाते हैं

इतने बिगड़े हैं वो मुझ से के अगर नाम उन के
ख़त भी लिखता हूँ तो सब हर्फ़ बिगड़ जाते हैं

क्यूँ न लड़वाएँ उन्हें ग़ैर के करते हैं यही
हम-नशीं जिन के नसीबे कहीं लड़ जाते हैं


सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है sab ko duniya ki havas khvaar

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सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है
कौन फिरता है ये मुरदार लिए फिरती है

घर से बाहर न निकलता कभी अपने ख़ुर्शीद
हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार लिए फिरती है

वो मेरे अख़्तर-ए-ताले की है वाज़ूँ गर्दिश
के फ़लक को भी निगूँ-सार लिए फिरती है

कर दिया क्या तेरे अबरू ने इशारा क़ातिल
के क़ज़ा हाथ में तलवार लिए फिरती है

जा के इक बार न फिरना था जहाँ वाँ मुझ को
बे-क़रारी है के सौ बार लिए फिरती है


रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू rind ae khrab haal ko zahid

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रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझ को पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू

नाख़ुन ख़ुदा न दे तुझे ऐ पंजा-ए-जुनूँ
देगा तमाम अक़्ल के बख़िये उधेड़ तू

इस सैद-ए-मुज़्तरिब को तहम्मुल से ज़ब्ह कर
दामान ओ आस्तीं न लहू में लथेड़ तू

छुटता है कौन मर के गिरफ़्तार-ए-दाम-ए-ज़ुल्फ़
तुर्बत पे उस की जाल का पाएगा पेड़ तू

ऐ ज़ाहिद-ए-दो-रंग न पीर आप को बना
मानिंद-ए-सुबह-ए-काज़िब अभी है अधेड़ तू

ये तंगना-ए-दहर नहीं मंज़िल-ए-फ़राग़
ग़ाफ़िल न पाँव हिर्स के फैला सुकेड़ तू

हो क़ता नख़ल-ए-उल्फ़त अगर फिर भी सब्ज़ हो
क्या हो जो फेंके जड़ ही से उस को उखेड़ तू

जो सोती भीड़ बाइस-ए-ग़ौग़ा जगाए फिर
दरवाज़ा घर का उस सग-ए-दुन्या पे भेड़ तू

उम्र-ए-रवाँ का तौसन-ए-चालाक इस लिए
तुझ को दिया के जल्द करे याँ से एड़ तू

आवारगी से कू-ए-मोहब्बत की हाथ उठा
ऐ 'ज़ौक़' ये उठा न सकेगा खखेड़ तू


क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए kufd ae sad khana ae dil aaya

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क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए
जो तिलिस्मात न टूटे थे कभू टूट गए

सैकड़ों कासा सर-ए-दहर में मानिंद-ए-हुबाब
कभू ऐ चर्ख़ बने तुझ से कभू टूट गए

टाँके क्या जैब के फिर बाद-ए-रफ़ू टूट गए
हो के नाख़ुन कभी सीने में फ़रव टूट गए

तू जो कहता है के दे ग़ैर को भी साग़र-ए-मय
हाथ क्या उस के हैं ऐ आईना-रू टूट गए

क्यूँके बिन कश्ती-ए-मय कीजिए सैर-ए-दरया
मै-कशो ज़ेर-ए-बग़ल अब तो कदू टूट गए

देख कर सुरमे की तहरीर तेरी आँखों में
काफ़िरों के भी हैं ज़ुन्नार गुलू टूट गए

सदमा-ए-ग़म से तेरे जूँ गुल-बाज़ी अफ़सोस
सारे आज़ा मेरे ऐ अरबदा-जू टूट गए

संग-ए-ग़ैरत से कई आईने ऐ अहद शिकन
देख कर साफ़ तेरा रू-ए-नकू टूट गए

तीर दिल से वो निकलते हैं कोई जज़्बा-ए-शौक़
निकले सो-फ़ार जो सीने से गुलू टूट गए

दिल शिकस्ता ही रहा बाद-ए-फ़ना भी मैं तो
के मेरी ख़ाक से बनते ही सुबू टूट गए

शिद्दत-ए-गिर्या से था रात ये अश्कों का हुजूम
चश्म-ए-तर फिर मेरे मिज़गाँ के हैं मू टूट गए

गुलशन-ए-इश्क़ में अल्लाह है क्या कसरत-ए-बार
बिन हवा कितने ही नख़्ल-ए-लब-ए-जू टूट गए

कह ब-तब्दील-ए-क़वाफ़ी ग़ज़ल इक और भी 'ज़ौक़'
देखें बिठलाए है किस तरह से तू टूट गए


क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं kasd jab teri jiyarat ka kabhu

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क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं
चश्म-ए-पुर-आब से आईने वज़ू करते हैं

करते इज़हार हैं दर-पर्दा अदावत अपनी
वो मेरे आगे जो तारीफ़-ए-अदू करते हैं

दिल का ये हाल है फट जाए है सौ जाए से और
अगर इक जाए से हम उस को रफ़ू करते हैं

तोडें इक नाले से इस कासा-ए-गर्दूं को मगर
नोश हम इस में कभू दिल का लहू करते हैं

क़द-ए-दिल-जू को तुम्हारे नहीं देखा शायद
सर-कशी इतनी जो सर्व-ए-लब-ए-जू करते हैं


नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा nimchaa yaar ne jis waqt bagal mei

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नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा
जो चढ़ा मुँह उसे मैदान-ए-अजल में मारा

माल जब उस ने बहुत रद्द-ओ-बदल में मारा
हम ने दिल अपना उठा अपनी बग़ल में मारा

उस लब ओ चश्म से है ज़िन्दगी ओ मौत अपनी
के कभी पल में जलाया कभी पल में मारा

खींच कर इश्क़-ए-सितम-पेशा ने शमशीर-ए-जफ़ा
पहले इक हाथ मुझी पर था अज़ल में मारा

चर्ख़-ए-बद-बीं की कभी आँख न फूटी सौ बार
तीर नाले ने मेरे चश्म-ए-ज़ुहल में मारा

अजल आई न शब-ए-हिज्र में और हम को फ़लक
बे-अजल तू ने तमन्ना-ए-अजल में मारा

इश्क़ के हाथ से ने क़ैस न फ़रहाद बचा
इस को गर दश्त में तो उस को जबल में मारा

दिल को उस काकुल-ए-पेचाँ से न बल करना था
ये सियह-बख़्त गया अपने ही बल में मारा

कौन फ़रयाद सुने ज़ुल्फ़ में दिल की तू ने
है मुसलमान को काफ़िर के अमल में मारा

उर्स की शब भी मेरी गोर पे दो फूल न लाए
पत्थर इक गुम्बद-ए-तुर्बत के कँवल में मारा

आँख से आँख है लड़ती मुझे डर है दिल का
कहीं ये जाए न इस जंग ओ जदल में मारा

हम ने जाना था जभी इश्क़ ने मारा उस को
तीशा फ़रहाद ने जिस वक़्त जबल में मारा

न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा


नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए, nahi sabaat bulandi ae ijj oh shaa

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नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए
के साथ औज के पस्ती है आसमाँ के लिए

हज़ार लुत्फ़ हैं जो हर सितम में जाँ के लिए
सितम-शरीक हुआ कौन आसमाँ के लिए

मज़े ये दिल के लिए थे न थे ज़बाँ के लिए
सो हम ने दिल में मज़े सोज़िश-ए-निहाँ के लिए

फ़रोग़-ए-इश्क़ से है रौशनी जहाँ के लिए
यही चराग़ है इस तीरह-ख़ाक-दाँ के लिए

सबा जो आए ख़स-ओ-ख़ार-ए-गुलिस्ताँ के लिए
क़फ़स में क्यूँके न फड़के दिल आशयाँ के लिए

दम-ए-उरूज है क्या फ़िक्र-ए-नर्दबाँ के लिए
कमंद-ए-आह तो है बम-ए-आसमाँ के लिए

सदा तपिश पे तपिश है दिल-ए-तपाँ के लिए
हमेशा ग़म पे है ग़म जान-ए-ना-तवाँ के लिए

वबाल-ए-दोश है इस ना-तवाँ को सर लेकिन
लगा रखा है तेरे ख़ंजर ओ सिनाँ के लिए

बयान-ए-दर्द-ओ-मोहब्बत जो हो तो क्यूँकर हो
ज़बान दिल के लिए है न दिल ज़बाँ के लिए

मिसाल-ए-नय है मेरे जब तलक के दम में दम
फ़ुग़ाँ है मेरे लिए और मैं फ़ुग़ाँ के लिए

बुलंद होवे अगर कोई मेरा शोला-ए-आह
तो एक और हो ख़ुर्शीद आसमाँ के लिए

चले हैं दैर को मुद्दत में ख़ानक़ाह से हम
शिकस्त-ए-तौबा लिए अर्मुग़ाँ मुग़ाँ के लिए

हजर के चूमने ही पर है हज्ज-ए-काबा अगर
तो बोसे हम ने भी उस संग-ए-आस्ताँ के लिए

न छोड़ तू किसी आलम में रास्ती के ये शय
असा है पीर को और सैफ़ है जवाँ के लिए

जो पस-ए-मेहर-ओ-मोहब्बत कहीं यहाँ बिकता
तो मोल लेते हम इक अपने मेहर-बाँ के लिए

ख़लिश से इश्क़ की है ख़ार-ए-पैरहन तन-ए-ज़ार
हमेशा इस तेरे मजनून-ए-ना-तवाँ के लिए

तपिश से दिल की ये अहवाल है मेरा गोया
बजा-ए-मग़्ज़ है सीमाब उस्तुख़्वाँ के लिए

मेरे मज़ार पे किस वजह से न बरसे नूर
के जान दी तेरे रू-ए-अर्क़-फ़िशाँ के लिए

इलाही कान में क्या उस सनम ने फूँक दिया
के हाथ धरते हैं कानों पे सब अज़ाँ के लिए

नहीं है ख़ाना-बदोशों को हाजत-ए-सामाँ
असासा चाहिए क्या ख़ाना-ए-कमाँ के लिए

न दिल रहा न जिगर दोनों जल के ख़ाक हुए
रहा है सीने में क्या चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ के लिए

न लौह गोर पे मस्तों की हो न हो तावीज़
जो हो तो ख़िश्त-ए-ख़ुम-ए-मय कोई निशाँ के लिए

अगर उम्मीद न हम-साया हो तो ख़ाना-ए-यास
बहिश्त है हमें आराम-ए-जावेदाँ के लिए

वो मोल लेते हैं जिस दम कोई नई तलवार
लगाते पहले मुझी पर हैं इम्तिहाँ के लिए

सरीह चश्म-ए-सुख़न-गो तेरी कहे न कहे
जवाब साफ़ है पर ताक़त ओ तवाँ के लिए

इशारा चश्म का तेरी यकायक ऐ क़ातिल
हुआ बहाना मेरी मर्ग-ए-ना-गहाँ के लिए

रहे है हौल के बरहम न हो मिज़ाज कहीं
बजा है हौल-ए-दिल उन के मिज़ाज-दाँ के लिए

बनाया आदमी को 'ज़ौक़' एक जुज़्व-ए-ज़ईफ़
और इस ज़ईफ़ से कुल काम दो जहाँ के लिए


नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता naala is shor se kyu mera duhai deta

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नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता
ऐ फ़लक गर तुझे ऊँचा न सुनाई देता

देख छोटों को है अल्लाह बड़ाई देता
आसमाँ आँख के तिल में है दिखाई देता

लाख देता फ़लक आज़ार गवारा थे मगर
एक तेरा न मुझे दर्द-ए-जुदाई देता

दे दुआ वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-जुनूँ को हर गाम
दाद ये तेरी है ऐ आबला-पाई देता

रविश-ए-अश्क गिरा देंगे नज़र से इक दिन
है इन आँखों से यही मुझ को दिखाई देता

मुँह से बस करते कभी ये न ख़ुदा के बंदे
गर हरीसों को ख़ुदा सारी ख़ुदाई देता

पंजा-ए-मेहर को भी ख़ून-ए-शफ़क़ में हर रोज़
ग़ोते क्या क्या है तेरा दस्त-ए-हिनाई देता

कौन घर आईने के आता अगर वो घर में
ख़ाक-सारी से न जारूब-ए-सफ़ाई देता

मैं हूँ वो सैद के फिर दाम में फँसता जा कर
गर क़फ़स से मुझे सय्याद रिहाई देता

ख़ू-गर-ए-नाज़ हूँ किस किस का के मुझे साग़र-ए-मय
बोसा-ए-लब नहीं बे-चश्म-नुमाई देता

देख गर देखना है 'ज़ौक़' के वो पर्दा-नशीं
दीदा-ए-रौज़न-ए-दिल से है दिखाई देता


न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से na khincho ashiq tishna jigar

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न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से
निकाले पर है मिस्ल-ए-माही-ए-तस्वीर पहलू से

न ले ऐ नावक-अफगन दिल को मेरे चीर पहलू से
के वो तो जा चुका साथ आह के जूँ तीर पहलू से

दिल-ए-सीपारा को ले टाँक तावीज़ों में हैकल के
न सरका ये हमाइल ऐ बुत-ए-बे-पीर पहलू से

वो हों बे-दस्त-ओ-पा बिस्मिल रसाई जब न हाथ आई
किया ता पा-ए-क़ातिल अज़ तह-ए-शमसीर पहलू से

असीर-ए-ज़ुल्फ़ दीवाने हैं देख ऐ पास-बाँ शब को
दबा कर बैठ उन के पाँव की ज़ंजीर पहलू से

मुसव्विर लैला ओ मजनूँ की ना-कामी पे हैराँ हैं
कभी बैठा न मिल कर पहलू-ए-तस्वीर पहलू से

ये दिल लब-तिश्ना तेग़-ए-यार का है रात भर करता
सदा-ए-अल-अतश जूँ नाला-ए-शब-गीर पहलू से

अजब हसरत का आलम था के मजनूँ कहता था पैहम
छूटे पहलू मेरे महमिल का या तक़दीर पहलू से

न कहना उस्तुख़्वाँ उन को ये आलम लाग़री का है
के है दिखला रहा मेरा दिल-ए-दिल-गीर पहलू से

ख़याल-ए-अबरू-ए-जानाँ नहीं अब भूलता इक दम
सिपाही है जुदा करता नहीं शमशीर पहलू से

तमाम अहल-ए-सुख़न बज़्म-ए-सुख़न में 'ज़ौक़' हैराँ हैं
मिला जो क़ाफ़िया तू ने किया तहरीर पहलू से


न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुवाँ होता na karta jabt mai naala to phir

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न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुवाँ होता
के नीचे आसमाँ के और पैदा आसमाँ होता

कहे है मुर्ग़-ए-दिल ऐ काश में ज़ाग़-ए-कमाँ होता
के ता शाख़-ए-कमाँ पर उस की मेरा आशयाँ होता

अभी क्या सर्द क़ातिल ये शहीद-ए-तुफ़्ता-जाँ होता
कोई दम शम्मा-ए-मुर्दा में भी है बाक़ी धुवाँ होता

न होती दिल में काविश गर किसी की नोक-ए-मिज़गाँ की
तो क्यूँ हक़ में मेरे हर मू-ए-तन मिस्ल-ए-सिनाँ होता

अज़ा-दारी में है किस की ये चर्ख़-ए-मातमी-जामा
के हबीब-ए-चाक की सूरत है ख़त्त-ए-कहकहशाँ होता

बगूला गर न होता वादी-ए-वहशत में ऐ मजनूँ
तो गुम्बद हम से सर-गश्तों की तुर्बत पर कहाँ होता

जो रोता खोल कर दिल तंगना-ए-दहर में आशिक़
तो जू-ए-कहकहशाँ में भी फ़लक पर ख़ूँ रवाँ होता

न रखता गर न रखता मुँह पे ये दाना मरीज़-ए-ग़म
मगर तेरा मयस्सर बोसा-ए-ख़ाल-ए-दहाँ होता

तेरे ख़ूनीं जिगर की ख़ाक पर होता अगर सब्ज़ा
तो मिज़गाँ की तरह उस से भी पैहम ख़ूँ रवाँ होता

रुकावट दिल की उस काफ़िर के वक़्त-ए-ज़ब्ह ज़ाहिर है
के ख़ंजर मेरी गर्दन पर है रुक रुक कर रवाँ होता

न करता ज़ब्त मैं गिर्या तो ऐ 'ज़ौक़' इक घड़ी भर में
कटोरे की तरह घडि़याल के ग़र्क़ आसमाँ होता


मेरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला। mere seene se tera teer jab ae jung

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मेरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला
दहान-ए-ज़ख़्म से ख़ूं हो के हर्फ़-ए-आरज़ू निकला

मेरा घर तेरी मंज़िल-गाह हो ऐसे कहाँ ताले
खुदा जाने किधर का चाँद आज ऐ माह-रू निकला

फिरा गर आसमाँ तो शौक़ में तेरे है सरगर्दां
अगर ख़ुर्शीद निकला तेरा गर्म-ए-जुस्तुजू निकला

मय-ए-इशरत तलब करते थे ना-हक़ आसमाँ से हम
वो था लबरेज़-ए-गम इस ख़ुम-कदे से जो सुबू निकला

तेरे आते ही आते काम आख़िर हो गया मेरा
रही हसरत के दम मेरा न तेरे रू-ब-रू निकला

कहीं तुझ को न पाया गरचे हम ने इक जहाँ ढूँढा
फिर आख़िर दिल ही में देखा बग़ल ही में से तू निकला

ख़जिल अपने गुनाहों से हूँ मैं याँ तक के जब रोया
तो जो आँसू मेरी आँखों से निकला सुर्ख़-रू निकला

घिसे सब नाख़ुन-ए-तदबीर और टूटी सर-ए-सोज़ान
मगर था दिल में जो काँटा न हरगिज़ वो कभू निकला

उसे अय्यार पाया यार समझे ‘ज़ौक़’ हम जिस को
जिसे याँ दोस्त अपना हम ने जाना वो अदू निकला


मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते। majaa tha humko jo laila

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मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते
के गुल तुम्हारी बहारों में आरज़ू करते

मज़े जो मौत के आशिक़ बयाँ कभू करते
मसीह ओ ख़िज़्र भी मरने की आरज़ू करते

ग़रज थी क्या तेरे तीरों को आब-ए-पैकाँ से
मगर ज़ियारत-ए-दिल क्यूँ के बे-वज़ू करते

अजब न था के ज़माने के इंक़िलाब से हम
तयम्मुम आब से और ख़ाक से वज़ू करते

अगर ये जानते चुन चुन के हम को तोड़ेंगे
तो गुल कभी न तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू करते

समझ ये दार ओ रसन तार ओ सोज़न ऐ मंसूर
के चाक-ए-पर्दा हक़ीक़त का हैं रफ़ू करते

यक़ीं है सुब्ह-ए-क़यामत को भी सुबुही-कश
उठेंगे ख़्वाब से साक़ी सबू सबू करते

न रहती यूसुफ़-ए-कनआँ की गर्मी-ए-बाज़ार
मुक़ाबले में जो हम तुझ को रू-ब-रू करते

चमन भी देखते गुलज़ार-ए-आरज़ू की बहार
तुम्हारी बाद-ए-बहारी में आरज़ू करते

सुराग़ उम्र-ए-गुज़िश्ता का कीजिए गर ‘ज़ौक़’
तमाम उम्र गुज़र जाए जुस्तुजू करते


मर्ज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे marj-ae-ishq jise ho use kya yaad

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मर्ज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे

तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे
न ख़ुदाई की हो परवा न ख़ुदा याद रहे

लोटते सैकड़ों नख़चीर हैं क्या याद रहे
चीर दो सीने में दिल को के पता याद रहे

रात का वादा है बंदे से अगर बंदा-नवाज़
बंद में दे लो गिरह ता के ज़रा याद रहे

क़ासिद-ए-आशिक़-ए-सौदा-ज़दा क्या लाए जवाब
जब न मालूम हो घर और न पता याद रहे

देख भी लेना हमें राह में और क्यूँ साहब
हम से मुँह फेर के जाना ये भला याद रहे

तेरे मद-होश से क्या होश ओ ख़िरद की हो उम्मीद
रात का भी न जिसे खाया हुआ याद रहे

कुश्ता-ए-नाज़ की गर्दन पे छुरी फेरो जब
काश उस वक़्त तुम्हें नाम-ए-ख़ुदा याद रहे

ख़ाक बर्बाद न करना मेरी उस कूचे में
तुझ से कह देता हूँ मैं बाद-ए-सबा याद रहे

गोर तक आए तो छाती पे क़दम भी रख दो
कोई बे-दिल इधर आए तो पता याद रहे

तेरा आशिक़ न हो आसूदा ब-ज़ेर-ए-तूबा
ख़ुल्द में भी तेरे कूचे की हवा याद रहे

बाज़ आ जाएँ जफ़ा से जो कभी आप तो फिर
याद आशिक़ को न कीजेगा भला याद रहे

दाग़-ए-दिल पर मेरे फाहा नहीं है अंगारा
चारा-गर लीजो न चुटकी से उठा याद रहे

ज़ख़्म-ए-दिल बोले मेरे दिल के नमक-ख़्वारों से
लो भला कुछ तो मोहब्बत का मज़ा याद रहे

हज़रत-ए-इश्क़ के मकतब में है तालीम कुछ और
याँ लिक्खा याद रहे और न पढ़ा याद रहे

गर हकीक़त में है रहना तो न रख ख़ुद-बीनी
भूले बंदा जो ख़ुदी को तो ख़ुदा याद रहे

आलम-ए-हुस्न ख़ुदाई है बुतों की ऐ 'ज़ौक़'
चल के बुत-ख़ाने में बैठो के ख़ुदा याद रहे


महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ mahfil mei shor ae kulkul

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महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ
ला साक़िया प्याला के तौबा का क़ुल हुआ

जिन की नज़र चढ़ा तेरा रुख़सार-ए-आतिशीं
उन का चराग़-ए-गोर न ता-हश्र गुल हुआ

बंदा-नवाज़ियाँ तो ये देखो के आदमी
जुज़्व-ए-ज़ईफ़ महरम-ए-असरार-ए-कुल हुआ

दरया-ए-ग़म से मेरे गुज़रने के वास्ते
तेग़-ए-ख़मीदा यार की लोहे का पुल हुआ

परवाना भी था गर्म-ए-तपिश पर खुला न राज़
बुलबुल की तंग-हौसलगी थी के गुल हुआ

आई तही-दरों की न हरगिज़ समझ में बात
आवाज़ा गो बुलंद मिसाल-ए-दुहुल हुआ

उस बिन रहा चमन में भी मैं ‘ज़ौक़’ दिल-ख़राश
नाख़ुन से तेज़-तर मुझे हर बर्ग-ए-गुल हुआ


मार कर तीर जो वो दिल-बर-ए-जानी माँगे maarkar ter jo vo dilbar

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मार कर तीर जो वो दिल-बर-ए-जानी माँगे
कह दो हम से न कोई दे के निशानी माँगे

ऐ सनम देख के हर दम की तेरी कम-सुख़नी
मौत घबरा के न क्यूँ ये ख़फ़क़ानी माँगे

ख़ाक से तिश्ना-ए-दीदार के सब्ज़ा जो उठे
तो ज़बाँ अपनी निकाले हुए पानी माँगे

मार-ए-पेचाँ तो बला हैगा मगर तू ऐ ज़ुल्फ़
है वो काफ़िर के न काटा तेरा पानी माँगे

दहन-ए-यार हो और माँगे किसी से दिल को
वो जो माँगे तो ब-अंदाज़-ए-निहानी माँगे

दिल मेरा बोसा-ब-पैग़ाम नहीं है हम-दम
यार लेता है तो ले अपनी ज़बानी माँगे

जलवा उस आलम-ए-मानी का जो देखे ऐ 'ज़ौक़'
लुत्फ़-ए-अलफ़ाज़ न बे-हुस्न-ए-मआनी माँगे


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