Thursday, 6 February 2020
ये क्या जाने में जाना है, जाते हो ख़फ़ा होकर|
ये क्या जाने में जाना है, जाते हो ख़फ़ा होकर|
मैं तब जानू मेरे दिल से चले जाओ जुदा होकर|
क़यामत तक उड़ेगी दिल से उठकर ख़ाक आँखों तक,
इसी रास्ते गया है हसरतों का काफ़िला होकर|
तुम्हीं अब दर्द-ए-दिल के नाम से घबराये जाते हो,
तुम्हीं तो दिल में शायद आए थे दर्द-ए-आशियाँ होकर|
यूँ ही हमदम घड़ी भर को मिला करते तो बहतर था,
के दोनो वक़्त जैसे रोज़ मिलते हैं जुदा होकर|
नसीम आए सुबह गुलशन
नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी|
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|
तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|
मज़ा आ जायेगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी हमारी और कहानी आप की होगी|
सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर दिख दूँगा,
हमारे साथ तुम होगे ये दुनिया देखती होगी|
यही आलम रहा पर्दानशीनों का तो ज़ाहिर है,
ख़ुदाई आप से होगी न हम से बंदगी होगी|
त'अज्जुब क्या लगी जो आग ऐ 'सीमाब' सीने में,
हज़ारों दिल मे अँगारे भरे थे लग गई होगी|
शेर-2
(1)
कोई उल्फत का दीवाना, कोई मतलब का दीवाना,
यह दुनिया सिर्फ दीवानों का घर मालूम होती है।
(2)
खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दें यह तो मुमकिन है,
मेरी वजहे-तबाही सिर्फ तूफां हो नहीं सकता।
(3)
छीन ली फ़िक्र-ए-निशेमन ने मेरी आजादियाँ,
जज्बा-ए-परवा महदूदे-गुलिस्ताँ हो गया।
(4)
जवानी ख्वाब की-सी बात है, दुनिया-ए-फानी में,
मगर यह बात किसको याद रहती है, जवानी मे।
(5)
तअज्जुब क्या लगी गर आग 'सीमाब' सीने में,
हजारों दिल में अंगारे भरे थे, लग गई होगी।
(6)
नहीं मिलते तो इक अदना शिकायत है न मिलने की,
मगर मिलकर, न मिलने की शिकायत और होती है।
शेर
(1)
कफस में खींच ले जाए मुकद्दर या निशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।
(2)
है हुसूले – आरजू का नाम तर्के -आरजू,
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे।
(3)
मेरे गुनाहों पर करें तब्सिरा लेकिन,
सिर्फ मैं ही तो गुनहगार नहीं।
(4)
बहुत मुश्किल है कैदे-जिन्दगी में मुतमइन होना,
चमन भी इक मुसीबत था कफस भी इक मुसीबत है।
(5)
फकत एहसासे-आजादी ही से आजादी इबारत है,
वही घर की दीवार है, वही दीवार, जिन्दा की।