Friday, 7 February 2020
दिल से ताअत तेरी नहीं होती
दिल से ताअत तेरी नहीं होती
हम से अब बंदगी नहीं होती
ज़ब्त-ए-ग़म भी मुहाल है हम से
और फ़रियाद भी नहीं होती
रास आती नहीं कोई तदबीर
यास-ए-जावेद भी नहीं होती
दी न जब तक हवा एक शोला-ए-इश्क़
ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं होती
अल-हज्र तिश्नगी-ए-इश्क़ ‘जिगर’
हाए तस्कीन ही नहीं होती
अपने ही सजद का है शौक मेरे सर-ए-नियाज़ में
अपने ही सजद का है शौक मेरे सर-ए-नियाज़ में
काबा-ए-दिल है महव हूँ नमाज़ में
पिंहाँ है गर ख़ाक डाल दीदा-ए-इम्तियाज़ में
जाम ओ ख़म ओ सबू न देख मय-कदा-ए-मजाज़ में
किस का फ़रोग-ए-अक्स है कौन महव-ए-नाज़ में
कौंद पही हैं बिजलियाँ आईना-ए-मजाज़ में
सुब्ह-ए-अज़ल है सुब्ह-ए-हुस्न शाम-ए-अबद है दाग़-ए-इश्क़
दिल है मक़ाम-ए-इर्तिबात सिलसिला-ए-दराज़ में
दफ़्न है दिल जगह जगह काबा है गाम गाम पर
सजदा कहाँ कहाँ करे कोई हरीम-ए-नाज़ में
हुस्न के आस्ताने पर नासिया रख के भूल जा
फ़िक्र-ए-क़ुबुल-ओ-रद न कर पेश-कश-ए-नियाज़ में
ख़ून के आँसुओं से है ज़ीनत-ए-हुस्न-ए-दिल ‘जिगर’
चाहिए दाग़-ए-इश्क भी सीना-ए-पाक-बाज़ में
आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ
आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ
अब कहाँ वो बादिया-पैमाइयाँ
जोश-ए-तूफाँ है न मौंजों का ख़रोश
अब लिए है गोद में गहराइयाँ
खेलते थे ज़िंदगी ओ मौत से
वो शबाब और आह वो कजराइयाँ
हम हैं सन्नाटा है और महवियतें
रात है और रूह की गहराइयाँ