Wednesday, 22 January 2020
तंग थी जा ख़ामिर-ए-ना-शाद में
तंग थी जा ख़ामिर-ए-ना-शाद में
आप को भूले हम उन की याद में
क्यूँ-कर उठता है ख़ुदा रंज-ए-क़फ़स
मर गए हम तो कफ़-ए-सय्याद में
वो जो हैं तारीख़ से वाक़िफ बताएँ
फ़र्क़ बाद-ए-आह ओ बाद-ए-आद में
याँ उम्मीद-ए-क़त्ल ही ने ख़ूँ किया
रह गई हसरत दिल-ए-जल्लाद में
बे-तअल्लुक़-पन भी आख़िर कै़द है
कै़द पाई ख़ातिर-ए-आज़ाद में
ग़म्जा-ए-शीरीं की दौलत से था
जो असर था तीशा-ए-फ़रहाद में
क्यूँ ख़बर पूछी तेरा बीमार हाए
मर गया शोर-ए-मुबारक-बाद में
बे-तकल्लुफ़ जी में जो आए करो
क्या धरा है नाला ओ फ़रियाद में
ध्यान तुझ को हो न हो पर ‘शेफ़्ता’
रात दिन रहता है तेरी याद में
रोज़ ख़ूँ होते है दो-चार तेरे कूचे में
रोज़ ख़ूँ होते है दो-चार तेरे कूचे में
एक हंगामा है ऐ यार तेरे कूचे में
फ़र्श-ए-रह हैं जो दिल-अफ़गार तेरे कूचे में
ख़ाक हो रौनक़-ए-गुलज़ार तेरे कूचे में
सरफ़रोश आते हैं ऐ यार तेरे कूचे में
गर्म है मौत का बाजार तेरे कूचे में
शेर बस अब न कहूँगा कि कोई पढ़ता था
अपने हाली मेरे अशआर तेरे कूचे में
न मिला हम को कभी तेरी गली में आराम
न हुआ हम पे जुज़ आज़ार तेरे कूचे में
मलक-उल-मौत के घर का था इरादा अपना
ले गया शौक़-ए-ग़लत-कार तेरे कूचे में
तू है और गै़र के घर जलवा-तराज़ी की हवस
हम हैं और हसरत-ए-दीदार तेरे कूचे में
हम भी वारस्ता-मिज़ाजी के हैं अपनी क़ाइल
ख़ुल्द में रूह तन-ए-ज़ार तेरे कूचे में
क्या तजाहुल से ये कहता है कहाँ रहते हो
तेरे कूचे में सितम-गार तेरे कूचे में
‘शेफ़्ता’ एक न आया तो न आया क्या है
रोज़ आ रहते है दो-चार तेरे कूचे में