Wednesday, 19 February 2020
बस इस क़दर है ख़ुलासा मेरी कहानी का
बस इस क़दर है ख़ुलासा मेरी कहानी का
के बन के टूट गया इक हुबाब पानी का
मिला है साक़ी तो रौशन हुआ है ये मुझ पर
के हज़्फ़ था कोई टुकड़ा मेरी कहानी का
मुझे भी चेहरे पे रौनक़ दिखाई देती है
ये मोजज़ा है तबीबों की ख़ुश-बयानी का
है दिल में एक ही ख़्वाहिश वो डूब जाने की
कोई शबाब कोई हुस्न है रवानी का
लिबास-ए-हश्र में कुछ हो तो और क्या होगा
बुझा सा इक छनाका तेरी जवानी का
करम के रंग निहायत अजीब होते हैं
सितम भी एक तरीक़ा है मेहरबानी का
'अदम' बहार के मौसम ने ख़ुद-कुशी कर ली
खुला जो रंग किसी जिस्म-ए-अर्ग़वानी का.
ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता
ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता
दुर्वेश के हुज्रे से ये मेहमाँ नहीं उठता
कहते थे के है बार-ए-दो-आलम भी कोई चीज़
देखा है तो अब बार-ए-गिरेबाँ नहीं उठता
क्या मेरे सफ़ीने ही की दरिया को खटक थी
क्या बात है अब क्यूँ कोई तूफ़ाँ नहीं उठता
किस नक़्श-ए-क़दम पर है झुका रोज़-ए-अज़ल से
किस वहम में सजदे से बयाबाँ नहीं उठता
बे-हिम्मत-ए-मर्दाना मसाफ़त नहीं कटती
बे-अज़्म-ए-मुसम्मम क़दम आसाँ नहीं उठता
यूँ उठती हैं अँगड़ाई को वो मरमरीं बाहें
जैसे के 'अदम' तख़्त-ए-सुलैमाँ नहीं उठता.
आगही में इक ख़ला मौजूद है
आगही में इक ख़ला मौजूद है
इस का मतलब है ख़ुदा मौजूद है
है यक़ीनन कुछ मगर वाज़ेह नहीं
आप की आँखों में क्या मौजूद है
बाँकपन में और कोई शय नहीं
सादगी की इंतिहा मौजूद है
है मुकम्मल बादशाही की दलील
घर में गर इक बोरिया मौजूद है
शौक़िया कोई नहीं होता ग़लत
इस में कुछ तेरी रज़ा मौजूद है
इस लिए तनहा हूँ मैं गर्म-ए-सफ़र
क़ाफ़िले में रह-नुमा मौजूद है
हर मोहब्बत की बिना है चाशनी
हर लगन में मुद्दआ मौजूद है
हर जगह हर शहर हर इक़्लीम में
धूम है उस की जो ना-मौजूद है
जिस से छुपना चाहता हूँ मैं 'अदम'
वो सितम-गर जा-ब-जा मौजूद है.