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Saturday, 25 January 2020
इज़्ज़त से बज़्मे-गुल में रहा आशियाँ मेरा।
इज़्ज़त से बज़्मे-गुल में रहा आशियाँ मेरा।
तिनकों की क्या बिसात मगर नाम हो गया॥
इक मेरा आशियाँ है कि जलकर है बेनिशाँ।
इक तूर है कि जब से जला नाम हो गया॥
मैं नहीं, लेकिन मेरा अफ़साना उनके दिल में है।
मैं नहीं, लेकिन मेरा अफ़साना उनके दिल में है।
जानता हूँ मैं कि किस रग में यह नश्तर रह गया॥
आशियाने के तनज़्ज़ुल से बहुत खुश हूँ कि वो,
इस क़दर उतरा कि फूलों के बराबर रह गया॥
ज़मानेवालों को पहचानने दिया न कभी
ज़मानेवालों को पहचानने दिया न कभी।
बदल-बदल के लिबास अपने इनक़लाब आया॥
सिवाय यास न कुछ गुम्बदे-फ़लक से मिला।
सदा भी दी तो पलटकर वही जवाब आया॥
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