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Sunday, 23 February 2020

क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये

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क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये
हर क़यामत हर मुसीबत हर बला मेरे लिये।

हर जफ़ा हर जौर हर सख़्ती रवा है आप को
हर शिकायत हर गिला है ना-रवा मेरे लिये।

तेग़े-अबरू, तेग़े-चीं, तेग़े-नज़र, तेग़े-अदा
कितनी तलवारों का पहरा रख दिया मेरे लिये।

मुझको तेरे वास्ते बे-मौत मर जाना पड़ा
तू न लेकिन भूल कर भी जी सका मेरे लिये।

क्यों न मेरी बे-कसी पर रो उठे ख़ुद बे-कसी
हो गया हर आसरा बे-आसरा मेरे लिये।

जो तिरे कूचे में आया वो सलामत कब रहा
मर गयी है मह्ज मेरी ही क़ज़ा मेरे लिये।

हुस्न तेरा तेरी गुमराही का मूजब बन गया
इश्क़ मेरा बन गया है रहनुमा मेरे लिये।

हो सका कोई न मुझ उफ़्तादा पा का दस्तगीर
मेरी मुश्किल ही हुई मुश्किल कुशा मेरे लिये।

अब न जाऊंगा में उन के आस्तां पर ऐ-'रतन'
आस्तां से कम नहीं हर नक़्शे-पा मेरे लिये।


Saturday, 22 February 2020

अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं

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अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात
अहले-गुलशन को कहां मालूम वीराने की बात।

इस क़दर दिलकश कहां होती है फर्जाने की बात
बात में करती है पैदा बात दीवाने की बात।

बात जब तय हो चुकी तो बात का मतलब ही क्या
बात में फिर बात करना है मुकर जाने की बात।

इसका ये मतलब क़ियामत अब दुबारा आएगी
कह गए हैं बातों-बातों में वो फिर आने की बात।

बात पहले ही न बन पाये तो वो बात और है
सख़्त हसरत नाक है बन कर बिगड़ जाने की बात।

दास्ताने-इश्क़ सुन कर हम पे ये उक़्दा खुला
दर हक़ीक़त इश्क़ है बे-मौत मर जाने की बात।

अब्र छाया है चमन है और साक़ी भी करीम
ऐसे आलम में न क्यों बन जाये पैमाने की बात।

इसमें भी कुछ बात है वो बात तक करते नहीं
सुन के लोगों की ज़बानी मेरे मर जाने की बात।

बात का ये हुस्न है दिल में उतर जाये 'रतन'
क्यों सुनाता है हमें दिल से उतर जाने की बात।


बड़ा बे-बहा है दफीना 'रतन' का

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बड़ा बे-बहा है दफीना 'रतन' का
की हर शेर है इक नगीना 'रतन' का
बहुत कम मयस्सर हुआ शायरों को
सुख़न में है जैसा क़रीना 'रतन' का
इधर 'शहजहांपुर' है इन का मक़्का
'नकोदर' उधर है मदीना 'रतन' का
रवानी में ऊनी है यक्ता-ए-दौरां
तबीयत 'रतन' की सफ़ीना 'रतन' का
परखने का जिस को सलीक़ा नहीं है
खरीदेगा क्या वो खज़ीना 'रतन' का
हैं ये रिंदे-मशरब बड़े ज़र्फ़ वाले
सलीके का पानी है पीना 'रतन' का
'मुनव्वर' है फानूस अगर ज़ात इन की
है फर्शे-नज़र आबगीना 'रतन' का।


सुना था और किताबों में देखा था

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सुना था और किताबों में देखा था कि अकबरे-आज़म के नौ वज़ीर थे जो नौ रतन कहे जाते थे। अब पंडोरी ज़िला गुरदासपुर से भी एक 'रतन' नुमायां हुआ। 'रतन' साहिब ने उर्दू कलाम के अलावा फ़ारसी और ज्योतिष में भी दस्तरस हासिल की है। ग़ज़ल के अलावा ये नज़्में भी कहते हैं और तारीख़ गोई में कामिल दस्तरस रखते हैं। जितनी तारीखें निकाली हैं वो क़ाबिले-तारीफ़ हैं।


मेरे हल्का-ए-एहबाब

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मेरे हल्का-ए-एहबाब में जो लोग मुझ से मशवरे-सुख़न करते हैं क़रीब पांच सौ के होंगे। इस फेहरिस्त में खुसूसियत के साथ आप का नाम है। आप का खुलूस और आप की शेवा बयानी आप के रौशन मुस्तक़बिल की दलील है।


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