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Wednesday, 2 January 2019

याद में अपने यार-ए-जानी की, yaad mei apne yaar a jaani ki

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याद में अपने यार-ए-जानी की
हम ने मर मर के ज़िंदगानी की

दोस्तो को अदू किया हम ने
कर के तारीफ़ यार-ए-जानी की

क्यूँ न रुसवा करे ज़माने में
ये कहानी ग़म-ए-नहानी की

रूह होएगी हश्र में साहब
इक निशानी सरा-ए-फ़ानी की

ख़ाक-सारी से बढ़ गया इंसाँ
अर्ज़ पर सैर आसमानी की

ज़र्द सूरत पे हिज्र में न हँसो
शरह है रंग-ए-ज़ाफ़रानी की

आज कल लखनऊ में ऐ 'अख़्तर'
धूम है तेरी ख़ुश-बयानी की


उल्फ़त ने तेरी हम को तो रक्खा न कहीं का ulfat ne teri hum ko to

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उल्फ़त ने तेरी हम को तो रक्खा न कहीं का
दरिया का न जंगल का समा का न ज़मीं का

इक़्लीम-ए-मआनी में अमल हो गया मेरा
दुनिया में भरोसा था किसे ताज ओ नगीं का

तक़दीर ने क्या क़ुतुब-ए-फ़लक मुझ को बनाया
मोहताज मेरा पाँव रहा ख़ाना-ए-ज़ीं का

इक बोरिए के तख़्त पे औक़ात बसर की
ज़ाहिद भी मुक़ल्लिद रहा सज्जादा-नशीं का

'अख़्तर' क़लम-ए-फ़िक्र के भी अश्क हैं जारी
क्या हाल लिखूँ अपने दिल-ए-ज़ार-ओ-हज़ीं का


सुना है कूच तो उन का पर इस को क्या कहिए, suna hai kooch to unka par isko kya

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सुना है कूच तो उन का पर इस को क्या कहिए
ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा कहिए

मिसी लगा के सियाही से क्यूँ डराते हो
अँधेरी रातों का हम से तो माजरा कहिए

हज़ार रातें भी गुज़रीं यही कहानी हो
तमाम कीजिए इस को न कुछ सिवा कहिए

हुआ है इश्क में ख़ासान-ए-हक़ का रंग सफ़ेद
ये क़त्ल-ए-आम नहीं शोख़ी-ए-हिना कहिए

तोराब-ए-पा-ए-हसीनान-ए-लखनऊ है ये
ये ख़ाक-सार है 'अख़्तर' को नक़्श-ए-पा कहिए


ग़ुँचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम Guncha A dil khile jo chaho tum

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ग़ुँचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम
गुलशन-ए-दहर में सबा हो तुम

बे-मुरव्वत हो बे-वफ़ा हो तुम
अपने मतलब के आश्ना हो तुम

कौन हो क्या हो क्या तुम्हें लिक्खें
आदमी हो परी हो क्या हो तुम

पिस्ता-ए-लब से हम को क़ुव्वत दो
दिल-ए-बीमार की दवा हो तुम

हम को हासिल किसी की उल्फ़त से
मतलब-ए-दिल हो मुद्दआ हो तुम

यही आशिक़ का पास करते हैं
क्यूँ जी क्यूँ दर-प-ए-जफ़ा हो तुम

उसी अख़्तर के तुम हुए माशूक़
हँसो बोलो उसी को चाहो तुम


गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं garmiya shokhiya kis shan

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गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं
क्या ही नादानियाँ नादान से हम देखते हैं

ग़ैर से बोसा-ज़नी और हमें दुश्नामें
मुँह लिए अपना पशेमान से हम देखते हैं

फ़स्ल-ए-गुल अब की जुनूँ-ख़ेज़ नहीं सद-अफ़सोस
दूर हाथ अपना गिरेबान से हम देखते हैं

आज किस शोख़ की गुलशन में हिना-बंदी है
सर्व रक़्साँ हैं गुलिस्तान से हम देखते हैं

'अख़्तर'-ए-ज़ार भी हो मुसहफ़-ए-रुख़ पर शैदा
फ़ाल ये नेक है कुरआन से हम देखते हैं


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