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Thursday, 13 February 2020

कश्मीर

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ये है रंगी बहारों की दुनिया
रूह परवर नज़ारों की दुनिया

वादियों, कोहसारों की दुनिया
नद्दियों जूएबारों की दुनिया

अंबरीं शाखसारों की दुनिया
गुल ज़मीं रहगुज़ारों की दुनिया

दिल कुशा मर्गज़ारों की दुनिया
जां फ़ज़ा आबशारों की दुनिया

गुल रुखों, गुल-अज़ारों की दुनिया
महवशों, माहपारों की दुनिया

हुस्न के ताजदारों की दुनिया।


फुटकर शेर / मेला राम 'वफ़ा'

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करम आये अताब आये सवाब आये जवाब आये
हमारे इजतिराबे-ग़म का देखें क्या जवाब आये।

• सांस चलता है मिरे सीने में कुछ रुक रुक कर
आज ये खेल बिगड़ता नज़र आता है मुझे

• घड़ी बीमारे-ग़म की आ गई क्या तुम न आओगे
उदासी बामो-दर पर छा गई क्या तुम न आओगे

• पासे-अदू से मुझ को मलामत न कीजिये
है है न कीजिये ये क़ियामत न कीजिये

• ख़ुदा से इक तरफ़, खुद से भी कोसों दूर होता है
बशर जिस वक़्त ताक़त के नशे में चूर होता है।

• यही हर हाल में क्यों ऐ सितम-ईजाद होता है
कि तुझ से जो वफ़ा करता है वो बर्बाद होता है।
ये कैसी बद-तमीज़ी है कि हर इरशादे-बेजा पर
बपा महफ़िल में तूफ़ाने "बजा इरशाद" होता है

• जी में आता है कि ये भी तज़रिबा कर देखिये
मर के मुमकिन हो विसाले-यार तो मर देखिए

• ताक़ते-ज़ब्ते-फुगां देखिये कब तक रहे
राज़े-महब्बत निहां देखिये कब तक रहे।

• अब तरीक़ा हुज़ूर का क्या है
इब्तिदा क्या थी इंतिहा क्या है

• अभी आप कमसिन हैं डर जाएंगे
न देखें मिरा दम निकलते हुए

• तस्कीं-असर था वादा-ए-बेऐतबार भी
यानि कि ऐतबार ही करना पड़ा मुझे।

• पाया न हम ने लुत्फ कोई दिन बहार का
यूँ बीतने को बीत गये दिन बहार के।

• जान पर खेलना मुश्किल है मगर याद रहे
खेलने पर कोई आ जाये तो आसान भी है

• नहीं चलती महब्बत में रियाज़ी
नहीं उन की मुकर्रर भी नहीं है

• भला जिस बज़्म में ग़ैरों की खिचड़ी पकती रहती हो
वहां कब ऐ दिले-नादां हमारी डाल गलती है।

• किसी को अपनी किसी आरज़ू से काम नहीं
दुआएं वक़्फ़ हैं उस आफ़ते-जहाँ के लिए

• मैं हूँ और आज़ारे-इस्तिकबाले-दुश्मन सुबहो-शाम
सौंप दी है उस ने अपने घर की दरबारी मुझे

• वे ताइर हो चुके आज़ाद जो इस वास्ते चुप हैं
फुगां करने से होते हैं दिले-सय्याद के टुकड़े
हवाए हमसरिए-कद्दे-बाला की सज़ा ये है
उड़ें अहले-चमन के सामने शमशाद के टुकड़े।

• ये कौन सैर को निकला है बाम पर शबे-माह
ये रात नूर के सांचे में ढल गई कैसी।

• कब से रुका खड़ा है जनाज़ा शहीद का
बैठे भी तुम नहीं अभी ज़ुल्फें संवारने।

• हाथ रह रह के मिरे बहरे-दुआ उठते हैं
यही ले दे के सहारा नज़र आता है मुझे।

• ये जल गया है तो अब बिजलियाँ भी चैन से हैं
बला था एक मिरा आश्यां चमन के लिए।

• वो ना-मुरादे-ज़ौक़-ख़लिश हूँ कि दश्त में
कांटे हैं सरनिगूं मिरे छालों के सामने।

• शैख़ जी ये सफाइयां तौबा
पी पिला कर बुराइयां तौबा।

• कहकहे ग़ैरों के हैं आठों पहर
  आफ़ते-जाँ है तिरी हम-सायेगी
  मौत बन कर आयेगा दिल का क़रार
  जान ले कर बेक़रारी जायेगी।

• किया ख़ूब वादा वफ़ा वाह वा
मियां वाह वा वाह वा वाह वा

• उमीदे-वफ़ा, 'वफ़ा' बुतों से
ऐ मर्दे-ख़ुदा, ख़ुदा ख़ुदा कर

• माज़ी की यादगार पे आ जा के रह गये
दिल पर जो दाग़ ख़ूने-तमन्ना के रह गये
ज़िक्रे-ख़ुदा है और न फ़िक्र-ए-मुआश है
हम आशिक़ी में दिन न दुनिया के रह गये।

• इस का गिला बजा कि ज़माना बदल गया
इस का इलाज क्या कि ज़माना बदल गया
साकी शराब ला की ज़माना बदल गया
मुतरिब! ग़ज़ल सुना के ज़माना बदल गया।

• ग़लत कहते हैं जो कहते हैं ऐसा हो नहीं सकता
उसी के हो गये सब जो किसी का हो नहीं सकता।


फुटकर शेर / मेला राम 'वफ़ा'

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फुटकर शेर / मेला राम 'वफ़ा'


मआले-कार मालूम इश्तियाके हम कलामी का
चिराग़े-तूर इक शोला है दाग़े-ना-तमामी का।

बाहम तुझे ग़ैरों से ऐ रश्क़े-क़मर देखा
देखा तो न जाता था नाचार मगर देखा
मिलने का न खिंचने का कुछ उन पे असर देखा
ये चाल भी चल देखी ये सहर भी कर देखा।

भला होता तो क्या होता, बुरा होता तो क्या होता
पडें इस बहस में अब क्या कि क्या होता तो क्या होता
दिल बे-मुद्दआ भी पाएमाले कस-म्पुर्सी है
महब्बत का अगर कुछ मुद्दआ होता तो क्या होता।

ख़ूने-जिगर आंखों से रवां हो के रहेगा
इक रोज़ अयाँ जख़्मे-जिगर हो के रहेगा।

• बे महरिए दोस्त का गिला क्या
दिल सी शये-हेच का गिला क्या
बरबादिए-दिल की क्या शिकायत
पामालिए शौक़ का गिला क्या

• हश्र में वो कह रहे हैं क़त्ल कर दूंगा अगर
वा लबे-फ़रयाद मेरे दाद-खाहों ने किया
दाद के क़ाबिल था मेरा ज़ब्ते-उल्फ़त बज़्म में
राज़ अफ्शा तेरी दुज़दीदा निगाहों ने किया

• गरीबों की नहीं जिन में रसाई
उन ऐवानों को अब ढाना पड़ेगा
हमीं बकते चले जाएंगे कब तक
तुम्हें भी कुछ तो फरकाना पड़ेगा

• मैं हूँ बेज़ार ज़माने भर से
और तुम मुझ से हो बेज़ार! ये क्या

• वो बोले मिरी ना'श को देख कर
ज़माना बड़ा बेवफ़ा हो गया।

• फलक का न छोड़ा ज़मीं का न छोड़ा
दिले-इश्क़-ख़ू ने कहीं का न छोड़ा
वो दुनिया के भी अब कहां रह गये हैं
जिन्हें ऐ बुतो तुम ने दीं का न छोड़ा।

• खलिश-कारी से दिल खूं कर दिया है तीरे-गमजा ने
बड़ी चाहत से ज़ालिम ने कलेजे में उतारा था

• मैं मिट गया तो गर्दिशे-दौरां भी थम गई
मेरे ही वास्ते सितम-रोज़गार था

• चला आया है मैखाने में तो ख़ाली न जा वाइज़
इधर आ कुछ अमामा रहम रख, कुछ दाम लेता जा

• तरीके अर्ज़-ए-मतलब ऐ 'वफ़ा' इस बज़्म में ये है
ज़बां को बंद रख और हिचकियों से काम लेता जा

• आदमी काम आ ही जाता है
  हमसे कीजे न इजतिराब बहुत
  लीजिये चल के कुछ 'वफ़ा' से सलाह
  उस ने देखे हैं इंकिलाब बहुत

• फिर मुझे आरज़ुए-ज़ीस्त हुई है पैदा
याद आई है उन्हें कद्रे-वफ़ा मेरे बाद

• वो बहरे-फातिहा आये हुए बैठे हैं मदफन पर
मुझे ख़ूने-जिगर रोना पड़ा है मर्गे-दुश्मन पर

• मुख़्तसर ये हैं हमारी दास्ताने-ज़िन्दगी
रात दिन सदमे गुज़रते हैं दिले-नाशाद पर

• बात इतनी सी है लेकिन लब पर आ सकती नहीं
चाहते हैं आप को और चाहते हैं दिल से हम

• नये आसार बर्बादी के हैं अब की बहारों में
बनाएं हैं नशेमन बिजलियों ने लालाज़ारों में।

• रही लड़ती रक़ीबों से वो चश्मे-शर्मगीं बरसों
महब्बत में दिले-बेताब पर छुरियां चलीं बरसों

• कहे अहले-दौलत से कौन ऐ 'वफ़ा'
की दौलत ही दुनिया में सब कुछ नहीं

• ज़राफत-कार है क्या क्या फ़िराके-यार पहलू में
उठी जो दर्द की रौ बन गई तलवार पहलू में
जिगर की बे-कली, दिल की तड़प सोने नहीं देती
शबे-फुरकत लिए बैठा हूँ दो बीमार पहलू में।

• पुरफिक्र हैं लड़कपन, ग़मगीं जवानियाँ हैं
ये ज़िंदगानियां भी क्या ज़िंदगानियां हैं
फ़रमा-रवाए-मुल्के-दिल हैं कलब की परियाँ
जो घर की रानियां हैं, बस घर की रानियाँ हैं।

• क़ियामत का उठाना है उठाना उनके कूचे से
ये दीवाने तुम्हारे जो तमाशा बन के बैठे हैं

• रवां है चश्मे-तर से आसुंओं के तार सावन में
ये तिफ्ले-अश्क़ हैं मेरे गले का हार सावन में

• उतर जाती हैं दिल में, जला देते हैं जो दिल को
वो आहें और होती हैं, वो नाले और होते हैं।

• इशारे अब्रुओं के भी हैं और तिरछी निगाहें भी
वो खंजर चल के रुकते हैं, ये छुरियां रुक के चलती हैं।

• दिले-वीरां हमारा शोरिश आबादे-तमन्ना है
हज़ारों बस्तियां बस्ती हैं इस उजड़े हुए घर में
ग़ज़ब है बन्दे-ख़ुद्दारी वा शौके-दश्त-पैमाई
उधर हैं पांव में चक्कर, इधर हैं पांव चक्कर में
समा सकता नहीं कुछ अपने जुज़ में, सर बसर बातिल
कि दिल में यार है, दिल यार की ज़ुल्फें मुअम्बर में।

• बंदों पे सितम बंदों के ऐ मेरे ख़ुदा देख
होता है खुदाई में तेरी आज ये क्या देख

• साफ दिल कहते हैं उस को इसलिए अहले-सफ़ा
ऐबो-ख़ूबी साफ़ रख देते हैं मुंह पर आइना

• तुझ को हैं नाले गरां और मुझ को मुश्किल ज़ब्ते-ग़म
नाज़ुकी अपनी भी देख और मेरी लाचारी भी देख।

• लबों पर जाने-ज़ार आती हुई मालूम होती है
ये दुनिया अब मुझे जाती हुई मालूम होती है

• शोख़ी न शरारत न हया और ही कुछ है
हम मरते हैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है
मालूम शिफ़ाए-याबिए-बीमारे-ग़मे-हिज्र
सब कहते हैं मंज़ूरे-ख़ुदा और ही कुछ है।


जवां बेटे की मौत।

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ले गई मुझ से सुकूने-क़ल्ब-ओ-जां बेटे की मौत
दे गई मुझ को अज़ाबे-जां स्तां बेटे की मौत

किस क़दर थे आह ख़ुश-आइंद मुस्तक़बिल के ख़ाब
किस क़दर थी दूर अज़ वहम-ओ-गुमां बेटे की मौत

इस लिए दस साल पहले ही किनारा कर गई
देखती किस आंख से 'बावा' की मां बेटे की मौत

पाप की बस्ती भले वक़्तों में कहते थे उसे
बाप की आंखों के आगे हो जहां बेटे की मौत

बाप जल इकलौते बेटे का हो बाप उस के लिए
है नज़ूल-ए-सद-बलाए नागहां बेटे की मौत

ज़िन्दगी भर दिल से जाने का नहीं बेटे का ग़म
ज़िन्दगी भर मुझ पे गुज़रेगी गरां बेटे की मौत

इस से बढ़ कर बद-नसीबी और क्या होगी 'वफ़ा'
बाप की आंखों के आगे हो जवां बेटे की मौत।


नाकामिए-जावेद है इनआमे महब्बत

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नाकामिए-जावेद है इनआमे महब्बत
नाकामे-महब्बत नहीं नाकामे-महब्बत

वाबस्ता-ए-आग़ाज़ थी ये है शामे-महब्बत
वो सुब्हे महब्बत थी ये है शामे-महब्बत

क्या हो गई ये सूरते-अय्याम -महब्बत
वो सुबहे-महब्बत है न वो शामे-महब्बत

था सुब्हे-महब्बत पीवे गुमां शामे अवध का
थी सुब्हे बनारस से हसीं शामे-महब्बत

पड़ता है कभी चैन न लगती है कभी आंख
आफ़त है अज़ाबे-सहर-ओ-शाम-महब्बत

छोड़ आये हैं दिल हुस्न के उस शहर में हम भी
आये न जहां से कभी पैग़ामे-महब्बत

डरते हैं वो दुनिया से ख़ुदा से नहीं डरते
डरते हैं जो लेते हुए इल्ज़ामे-महब्बत

इल्ज़ामे-महब्बत दो ब-सद शौक़ मुझे तुम
लेता हूँ ब-सद शौक़ में इल्ज़ामे-महब्बत

हुशियार ख़बरदार कि ये दामे-रिया है
समझा है जिसे तू ने 'वफ़ा' दामे-महब्बत।


होता है दिले-सोज़ ब-जां साज़े-महब्बत

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होता है दिले-सोज़ ब-जां साज़े-महब्बत
उठती है इसी साज़ से आवाज़े-महब्बत

मैं रात के सन्नाटे में सुनता हूँ लगातार
तासीर में डूबी हुई आवाज़े-महब्बत

बजते हैं मिरे कान कि आती है कहीं से
आवाज़े-महब्बत पसे-आवाज़े-महब्बत

करता हूँ मैं आवाज़े-महब्बत का तआकुब
और मेरे तआकुब में है आवाज़े-महब्बत

कुछ है भी इस आवाज़ के पर्दे में कि यारब
आवाज़ ही आवाज़ है आवाज़े-महब्बत

आवाज़े-महब्बत तो है दुनिया से मुखातिब
दुनिया ही नहीं गोशे-बर आवाज़े-महब्बत

शोरिश गहे दुनिया में कि दुनिया है हवस की
बे-वक़्त की आवाज़ है आवाज़े-महब्बत

वो वक़्त न क्या आयेगा दुनिया में 'वफ़ा' अब
जब वक़्त की आवाज़ थी आवाज़े-महब्बत।


बरसों से हूँ मैं ज़मज़मां परज़ादे-महब्बत

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बरसों से हूँ मैं ज़मज़मां परज़ादे-महब्बत
आई न जवाबन कभी आवाज़े-महब्बत

इक दर्द महब्बत है मिरी हर रगो-पै में
हर सांस है अब मेरा इक आवाज़े-महब्बत

हर चंद की हर बज़्म में ठुकराई गयी है
आवाज़े-महब्बत है आवाज़े-महब्बत

मामूर हैं आवाज़े-महब्बत से फज़ाएं
मस्तूर है गो साहिब आवाज़े-महब्बत

आ जाये ज़रा सीनाए-आफाक में गर्मी
हो जाये ज़रा शोला ज़न आवाज़े-महब्बत

जिस शख्स के सीने में है दिल की जगह पत्थर
समझेगा वो क्या मानी-ए-आवाज़े-महब्बत

इस दौरे-तगो-दौ में 'वफ़ा' कौन सुनेगा
कितनी ही दिल-आवेज़ हो आवाज़े-महब्बत


हक़ीक़त में बाबे-महब्बत नही

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हक़ीक़त में बाबे-महब्बत नहीं
वो दिल जो खराबे-महब्बत नहीं

नहीं हर बशर लज़ज़ते-ग़म का अहल
की हर दिल को ताबे-महब्बत नहीं

ये शहर-निगारां है ए दिल यहां
महब्बत जवाबे महब्बत नहीं

हमारी निगाहों में क़ाफिर है वो
जो अहले-किताबे महब्बत नहीं

गरां है मुझे मुफ़्त भी वो किताब
कहीं जिस में बाबे-महब्बत नहीं

तग़ाफ़ुल तो है हुस्न की एक अदा
तग़ाफ़ुल हिजाबे-महब्बत नहीं

वो ख़ाली है जो दर्द-ओ-तासीर से
नवाए-रबाबे-महब्बत नहीं

महब्बत का हासिल कुछ ऐ दोस्तो
बजुज़ इजतिराबे महब्बत नहीं।

तू सर ख़ुश है ऐ दिल जिस उम्मीद पर
वो ताबीरे-ख़ाबे- महब्बत नहीं

ये उज़्र-ए-सितम और जो कुछ भी हो
मगर इंकिलाबे-महब्बत नहीं।

जो ढलता नहीं उम्र भर वो शबाब
सिवाए शबाबे-महब्बत नहीं

क़ुबूल ऐ खिज़र मुझ को आबे-हयात
बजाए शराबे-महब्बत नहीं

सरूर आवरी में मये-अरग़वां
हरीफ़े शराबे-महब्बत नहीं

है दरमां पज़ीर ऐ 'वफ़ा' हर अज़ाब
मगर हाँ अज़ाबे-महब्बत नहीं।


ऐसे इंक़लाब अक्सर राएगां ही जाते हैं

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ऐसे इंक़लाब अक्सर राएगां ही जाते हैं
जो निज़ामे-आलम में किस्तवार आते हैं

बद उसूल, बद बातन, बद चलन दुश्मन
जब भी दनदनाते थे अब भी दनदनाते हैं

खून देने वालों को पूछता नहीं कोई
दूध पीने वाले अब मर्तबे भी पाते हैं

दुश्मनों से सहवन भी जो कभी न खाते हम
दोस्तों से दानिश्ता वो फ़रेब खाते हैं।


बहुत आगाज़ देखे हैं बहुत अंजाम देखे हैं

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बहुत आगाज़ देखे हैं बहुत अंजाम देखे हैं
बहुत नक़्शे तिरे ऐ गर्दिशे-अय्याम देखै हैं

रपट जिन सूफियों ने की है मेरे बदखरोशी की
कुछ उन में हम-प्याला दोस्तों के नाम देखे हैं

ये आलम आलमे-इम्कां है मुमकिन है यहां ये भी
ज़बू-आगाज़ भी अक्सर निको-अंजाम देखे हैं।


रही वक़्के-अज़ाब ऐ हमनशीं जाने हज़ी बरसों

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रही वक़्के-अज़ाब ऐ हमनशीं जाने हज़ी बरसों
सहेगा कोई क्या जो सख्तियां हम ने सहीं बरसों

निकलना था न निकला अख़्तर-ए-तक़दीर गर्दिश से
दुआएं मुद्दतों मांगीं मुनाजातें भी कीं बरसों

मिरी तारीक़ दुनिया है वो दुनिया यास ओ हमीं की
जहां उम्मीद की सूरत नज़र आती नहीं बरसों

वो साज़िश ग़ैर के ईमाँ पे थी शैख़-ओ-बरहमन की
जो देखी है मिरी आंखों ने जंगे-कुफ़्र-ओ-दीं बरसों

ये माबादे-फ़ना भी दिल की बेताबी न जायेगी
नज़र आयेगी लरजां मेरे मर्कद की ज़मीं बरसों।


नहीं नहीं नहीं अब वो पलट के आने का

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नहीं नहीं नहीं अब वो पलट के आने का
ज़माने वालों में चर्चा है जिस ज़माने का

नहीं नहीं वो नहीं जिस का ख़ाब देखा था
कुछ और रंग है बदले हुए ज़माने का

हमः ग़ुरूर, सरापा फ़तूर महज़ फुज़ूर
ख़ुदा से दूर है इंसान इस ज़माने का

तिरी फ़िज़ूल सराई से उठता है ये सवाल
कि तू अजूबा है ऐ शैख़ किस ज़माने का

रहेंगे हो के ज़माने की बेरुखी का शिकार
जो लोग रुख़ नहीं पहचानते ज़माने का

न इस लिए जो 'वफ़ा' के कमाल से मुन्कर
की ये ग़रीब है शायर तिरे ज़माने का


हम रोबे हुस्ने-यार से तुतला के रह गये

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हम रोबे हुस्ने-यार से तुतला के रह गये
शिकवे ज़बां तक आये मगर आ के रह गये

आया न कोई ले के ख़ते-शौक़ का जवाब
सब नामाबर न जाने कहां जा के रह गये

ईफ़ाए-वादा का न दिला पाए वो यक़ीन
खाई हुई थी एक क़सम खा के रह गये

वो फूल मेरी आरजुओं की है इक मिसाल
खिलने से पेश्तर ही जो मुरझा के रह गये

शामिल वो कारवां में हुए किस बिसात पर
जो लोग रास्ते ही में सुस्ता के रह गये

नग़मा तो इक तरफ न हुआ नाला भी रवां
सब तार साज़े-शौक़ के थर्रा के रह गये

यूँ सा लगा कि मुझ पे घड़ों पानी पड़ गया
जब अर्ज़-ए-मुद्दआ पे वो शर्मा के रह गये

महफ़िल में कर रहे थे वो ग़ैरों से शोखियाँ
मुझ पर पड़ी निगाह तो शर्मा के रह गये

उट्ठे थे ले के दावा-ए-अज़मत जो ऐ 'वफ़ा'
अजदाद के अरूज़ पे इतरा के रह गये।


इस से कोई बहस नहीं क्या किया

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इस से कोई बहस नहीं क्या किया
जो भी किया आप ने अच्छा किया

तुझ को मेरे हुस्न से शुहरत मिली
मुझ को मेरे इश्क़ ने रुसवा किया

हक़ ने तुझे इशरते-इमरोज़ दी
मुझ को रहीने-ग़मे-फ़र्दा किया

किस से हुआ तर्के-तमन्ना यहां
किस ने यहां तर्के-तमन्ना किया

मिलता मुक़द्दर का भी क्यों कर मुझे
मैं ने हमीय्यत का न सौदा किया

वादा तेरा शाम को आने का था
राह तेरी सुब्ह से देखा किया

फर्ते-अक़ीदत से रहे-शौक़ में
सजदा ब-हर नक़्शे-पा किया

दुश्मनों को दुश्मनों से शिकवा क्यों
दोस्तों ने दोस्तों से क्या किया।


दिल की तस्कीं का आसरा न हुआ

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दिल की तस्कीं का आसरा न हुआ
सितम उन का करम-नुमा न हुआ

मेरे नालों से हिल गये अफ्लाक
तेरे दिल पर असर ज़रा न हुआ

जख़्म वो क्या जो भर गया आखिर
दर्द वो क्या जो ला-दवा न हुआ

टीस दिल की कभी फिरो न हुई
हाथ दिल से कभी जुदा न हुआ।

तेग़ जब इम्तिहान की उट्ठी
कोई आगे मेरे सिवा न हुआ

तू न चाहे तो और बात है ये
तूने चाहा जो किसी से वा न हुआ

तार टूटा तिरे तग़ाफ़ुल का
मिट गया मैं तो कुछ बुरा न हुआ

देर उस ने भी की तो आने में
सब्र तुझ से भी ऐ 'वफ़ा' न हुआ।


हंसते हंसते खफ़ा हो गए हम

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हंसते हंसते खफ़ा हो गए हम
यक बयक क्या से क्या हो गये हम

उम्र को सुख का न इक सांस आया
जिस के दुख की दवा हो गये हम

आइना है जबीं बे दिली का
किस के दर्द आश्ना हो गये हम

और ही है अदा बरहमी की
और भी दिलरुबा हो गये हम

हाथ खेंचा जफ़ा से भी तुम ने
किस क़दर बे-वफ़ा हो गये तुम

हो गयी सब ख़ुदाई तुम्हारी
होते होते ख़ुदा हो गये हम

कितने नादां हो पूछते हो
किस पे गश ऐ 'वफ़ा' हो गये हम।


दिल न क्यों ले बलाएं तुम्हारी

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दिल न क्यों ले बलाएं तुम्हारी
दिलरुबा हैं अदाएं तुम्हारी

तुम को दिलशाद रक्खे ज़माना
आएं ठंडी हवाएं तुम्हारी

राह तकते हैं सावन के झूले
मुंतज़िर हैं घटाएं तुम्हारी

खून में हम को नहलाएंगी अब
ग़ैर से इल्तिजाएं तुम्हारी

ग़ैर से शोखियों बरमला हैं
क्या हुईं वो हयाएं तुम्हारी

बदगुमानी है तुम को हमीं से
जो क़सम भी न खाएं तुम्हारी

तुम हमारी वफ़ा आज़माओ
हम जफ़ा आज़माएं तुम्हारी

उठ चुका इस नज़ाकत पे खंज़र
बैठो बाहें दबाएं तुम्हारी

गाई जाती हैं ग़ज़लें 'वफ़ा' की
बंध रही हैं हवाएं तुम्हारी।


माज़ूर हैं बकते चले जाते हैं अगर हम

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माज़ूर हैं बकते चले जाते हैं अगर हम
क्यों कर रहे खमोश कि रखते हैं नज़र हम

होता है जो कुछ उस का भी केते हैं असर हम
होना है जो कुछ उस की भी देते हैं ख़बर हम

बस वादे ही वादे हैं ये सौ बार के वादे
कब तक इन्हें हर रोज़ सुनें बार-ए-दिगर हम

दुश्मन को भी वो हाल न पेश आए ख़ुदाया
दिन उम्र के जिस हाल में करते हैं बसर हम

हालात की इस्लाह तो है दूर की इक बात
हालात को पहले से भी पाते हैं बतर हम

मुरझाये हुए चेहरों पे सहमी हुई आंखें
हर सम्त यही देखना हैं शाम-ओ-सहर हम

होता है अगर अर्ज़-सितम पर तो बला से
हो जाये मिज़ाज उस सितम-ईजाद का बरहम

ज़ाहिर है 'वफ़ा' सूरत-ए-अहवाले चमन से
होने को है अब नज़्मे- चमन दरहम-ओ-बरहम।


रवां नग़मों का इस से ख़ुद ब-ख़ुद सैलाब होता है

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रवां नग़मों का इस से ख़ुद ब-ख़ुद सैलाब होता है
रबाबे हुरर्यत कब तश्ना-ए-मिजराब होता है

बड़ी दिलकश है आज़ादी के गुलशन की फ़ज़ा लेकिन
ये गुलशन ज़िन्दगी के ख़ून से शादाब होता है

अगर छोटा हुआ हो जी, तो डर लगता है साहिल से
क़वी हो दिल तो बहरे बेकरां पायाब होता है

टपक पड़ता है जो यादे-वतन में चश्मे-महज़ू से
वो क़तरा अश्क़ का रश्क़े दुर-नायाब होता है।


बात कुछ दिल की तो क्या बन पायेगी

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बात कुछ दिल की तो क्या बन पायेगी
हां हमारी जान पर बन जायेगी

मौत को आना है इक दिन आयेगी
जान को जाना है आख़िर जायेगी

सो तो जायेगा अजल की गोद में
आंख तो बीमार की लग जायेगी

आप रो रो के मनाएं ग़ैर को
ये क़ियामत किस से देखी जायेगी

और कोई ख़िदमत ए नासिह बता
मयकशी हम से न छोड़ी जायेगी

हिचकियों में कट गया दिन ऐ 'वफ़ा'
सिसकियों में रात भी कट जायेगी।


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