Wednesday, 19 February 2020
हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस
हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस
क्या अभी बाक़ी है कोई और रूसवाई कि बस
आश्ना राहें भी होती जा रही हैं अजनबी
इस तरह जाती रही आँखों से बीनाई कि बस
तो सहर करते रहे हम इंतिज़ार-ए-मेहर-ए-नौ
देखते ही देखते ऐसी घटा छाई कि बस
ढूँडते ही रह गए हम लाल ओ अलमास ओ गुहर
कोर बद-बीनों ने ऐसी ख़ाक छनवाई कि बस
कुछ शुऊर ओ हिस का था बोहरान हम में वर्ना हम
अहद-ए-नौ की इस तरह करते पज़ीराई कि बस
क्या नहीं कज-अक्स आईनों का दुनिया में इलाज
जिस को देखो है अजब महव-ए-ख़ुद-आराई कि बस
चाकरी करते हुए भी हम रहें आज़ाद-रौ
दस्त-ओ-पा-ए-शौक़ में है वो तवानाई कि बस
आह क्या करते कि हम आदी न थे आराम के
चोट इक इक गाम पर अलबत्ता वो खाई कि बस
इस हसीं गीती के खुल कर रह गए सब जोड़-बंद
चंद पागल ज़र्रों को आई वो अँगड़ाई कि बस
वो तो कहिए बात कि फ़ुर्सत न थी वर्ना अजल
पूछती गाव-ए-ज़मीं से और पसपाई कि बस
कौन शाइर था कहीं का कौन दानिश-वर मगर
दफ़्तरों की दौड़ ‘वामिक़’ ऐसी रास आई कि बस
अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है
अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है
ये कम कि आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार बाक़ी है
अभी तो शहर के खण्डरों में झाँकना है मुझे
ये देखना भी तो है कोई यार बाक़ी है
अभी तो काँटों भरे दश्त की करो बातें
अभी तो जैब ओ गिरेबाँ में तार बाक़ी है
अभी तो काटना है तिशों से चट्टानों को
अभी तो मरहला-ए-कोहसार बाक़ी है
अभी तो झेलना है संगलाख़ चश्मों को
अभी तो सिलसिल-ए-आबशार बाक़ी है
अभी तो ढूँडनी हैं राह में कमीं-गाहें
अभी तो मारका-ए-गीर-ओ-दार बाक़ी है
अभी न साया-ए-दीवार की तलाश करो
अभी तो शिद्दत-ए-निस्फु़न-नहार बाकी है
अभी तो लेना है हम को हिसाब-ए-शहर-ए-क़िताल
अभी तो ख़ून-ए-गुलू का शुमार बाक़ी है
अभी यहाँ तो शफ़क़-गूँ कोई उफ़ुक़ ही नहीं
अभी तसादुम-ए-लैल-ओ-नहार बाक़ी है
ये हम को छेड़ के तन्हा कहाँ चले ‘वामिक़’
अभी तो मंज़िल-ए-मेराज-ए-दार बाक़ी है