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Wednesday, 12 February 2020

इधर लली है, उधर श्याम लला!! होली में।

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इधर लली है, उधर श्याम लला!! होली में।
देखो दोनों क्या रंग दिखाते हैं होली में।
नज़र चुटकियाँ दौड़ती हैं दोनों की अगर-
न जाने किसका हृदय किसने छुआ होली में।
ये ज़िद पड़ी कि पीछे हटाए कौन किसे,
मुकाबला ये दोनों का भला कैसा हो होली में।
कभी जुदा कभी एक है, दोनों का स्वरूप,
ये श्याम गौर की प्यारी है कला होली में।
किसी की कोई हार जीत जो देखी नहीं वहाँ,
तो ‘बिन्दु’ दोनों पै दिल हार चला होली में॥


हमको जग ने ख़ुद ही छोड़ा,

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हमको जग ने ख़ुद ही छोड़ा,
हमने तो जग में रहने का किया प्रयत्न न थोड़ा।
समझाने पर कभी न माना ये मस्ताना घोड़ा,
गई हेकड़ी भूल गया जब तिरस्कार का कोड़ा।
जिनसे सम्बन्ध कठिन पर्ण और प्रेम का जोड़ा,
स्वार्थ निकल जाने पर सबने हमसे नाता तोड़ा।
जिनके हित धन धाम धर्म, ईश्वर से भी मुख मोड़ा,
उन सबने सुखमय जीवन के पथ में अटकाया रोड़ा।
पीड़ा देता था विषयों का पका हुआ था फोड़ा,
अश्रु ‘बिन्दु’ विष निकल पड़ा जब अन्त:करण निचोड़ा॥


इस कदर श्याम से ही इश्क़ औ करम होने दो,

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इस कदर श्याम से ही इश्क़ औ करम होने दो,
जी से उल्फ़त को घड़ी भर भी कम न होने दो।
दिल ये कहता है तसव्वुर को न मिटने दो कभी,
आँख कहती है कि दीदार-ए-सनम होने दो।
मचल रही है ज़ुबाँ तर्ज़े बयानी के लिए,
होश कहता है कि मुझमे भी तो दम होने दो।
जान कहती है कि क़ुर्बान मैं हूँगी पहले,
सिर ये कहता है कि पहले मुझे कलश होने दो।
आँख के ‘बिन्दु’ ये कहता है कि हट जाओ सभी,
तर ब तर हमसे ज़रा उनके क़दम होने दो।


न तो रूप है न तो रंग है,

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न तो रूप है न तो रंग है,
न तो गुणों की कोई खान है।
फिर श्याम कैसे शरण में लें,
इसी सोच फिक्र में जान है।
नफ़रत है जिनसे उन्हें सदा,
उन्हीं अवगुणों में मैं हूँ बँधा।
कलि कुटिलता है कपट भी है,
हठ भी और अभिमान भी है।
तन मन वचन से विचार से,
लगी लौ है इस संसार से।
पर स्वप्न में भी तो भूलकर,
उनका कुछ भी न ध्यान है।
सुख-शान्ति की तो तलाश है,
साधन न एक भी पास है।
न तो योग है न तप कर्म है,
न तो धर्म पुण्य दान है।
कुछ आसरा है तो यही,
क्यों करोगे मुझ पे कृपा नहीं।
इक दीनता का हूँ ‘बिन्दु’ मैं,
वो दयालुता के निधान हैं।


ग़ैर मुमकिन है कि दुनिया अपनी मस्ती छोड़ दे,

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ग़ैर मुमकिन है कि दुनिया अपनी मस्ती छोड़ दे,
इसलिए तू भी यह, बेकार बस्ती छोड़ दे॥
तू न बन्दा बन ख़ुदा का, औ’ ख़ुदा तू भी न बन,
हस्ती-ए-उल्फ़त में मिल जा तू अपनी हस्ती छोड़ दे॥
ख़ुद तरसाया है तेरी ख्वाहिशो को कुछ तरसती छोड़ दे,
तुझको भी मन्सूर सा, मशहूर होना है अगर,
जानो दिल देने से अपनी, तय हस्ती छोड़ दे।
‘बिन्दु’ आँखों के तेरे, दिखलाएँगे फस्लों भार,
भरके आहों की घटाओं को, बरसती छोड़ दे॥


अवधनाथ, ब्रजनाथ, तुम्हारा सदा मैं दास रहूँ।

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अवधनाथ, ब्रजनाथ, तुम्हारा सदा मैं दास रहूँ।
जहाँ-जहाँ भी जन्मूँ जग में पद पंकज के पास रहूँ॥
मणि पर्वत या गोवर्धन गिरी का तरीन मूल बना देना।
या प्रमोद वन, या वृदावन का, फल फूल बना देना॥
या सरिता सरयू, या कालिन्दी का, कूल बना देना।
अवधभूमि, ब्रजभूमि कहीं के पथ की धूल बना देना॥
या बनकर सरचाप रहूँ या बनकर बंशी बाँस रहूँ।
जहाँ-जहाँ भी जन्मूँ जग में पद पंकज के पास रहूँ॥
ब्रजनिकुंज की बाट बनूँ या केवट गंगा का घात बनूँ।
शुक का हृदय बनूँ या नारद वीणा का ठाट बनूँ॥
युगल नाम का जप करता प्रतिपल, प्रतिक्षण प्रतिस्वाँस रहूँ।
जहाँ-जहाँ भी जन्मूँ जग में पद पंकज के पास रहूँ॥


भीजत श्याम कुञ्जन में दोऊ अटके।

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भीजत श्याम कुञ्जन में दोऊ अटके।
प्रिय पाहुने भये विपटन के, पावन सरयू तट के।
पवन झकझोर लली मुख मोरति छिपत छोर पिय पट के॥
युगल स्वरूप अनूप छटा लखि रति मनोज मन भटके।
इक टक छवि रस ‘बिन्दु’ पियत दृग पलभर हटत न हटके॥


दोऊ जने लेत लतन की ओटें।

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दोऊ जने लेत लतन की ओटें।
कछु पुरवाई चलत घन गर्जत, कुछ बदन की चोटें।
डरपति सिय, पट छाँह करत पिय, बाँधि भुज की कोटें॥
उत फहरत पचरंगी पगिया इत चूनर की गोटें।
यह छवि लखि दृग ‘बिन्दु’ प्रिया प्रीतम के पाँय पलोटें॥


चलो सखी चलिए री जहाँ झूलत युगल किशोर।

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चलो सखी चलिए री जहाँ झूलत युगल किशोर।
घटा घिर आई बूँदें झरिलाइ शोर करे दादुर चातक॥
कोकिल नाचत मोर झूलत युगल किशोर।
अवध बिहारी, जनक दुलारी, झुमि-झुमि झमकि झुकत॥
झोंकन सों झकझोर, झूलत युगल किशोर।
सखियाँ झुलावें, मंगल गावें, अम्बुनिधि आनन्द को॥
जनु लेत तरंग हिलोर, झूलत युगल किशोर।
प्रभा समसिय, चन्द्र सियपिय, लखिसुख पावत, प्यास बुझावत।
‘बिन्दु’ चकोर झूलत युगल किशोर॥


बाँका झूला सिय साजन कारी,

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बाँका झूला सिय साजन कारी,
मोतिनहार, बंदनवार, हीरे हज़ार की कतार।
बार-बार छवि निहार, रतिपति निजमद भुलारी॥ बाँका झूला...
चम्पा, चमेली, मोतिया, बेला, जूही अकेली छवि सकेली।
झेलि-मेलि करत केलि, फूलों की महक से फूलारी॥
तापै विराजे अवधराज, जनक जी समेत आज।
लखत लाज त्यागि, सुजन छवि हरण विविध शूलारी॥ बाँका झूला...
अरुण बरण मंगल करण, दोऊ पिय प्यारी के चरण।
शरण ‘बिन्दु’ पातकी के सोई जीवन धन मूलारी॥ बाँका झूला...


हिंडोले झूलत दोऊ सरकार

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हिंडोले झूलत दोऊ सरकार
श्री मिथिलेश लली संग राजत श्री अवधेश कुमार।
दामिनि गरजि गरजि घन बरसत रिमझिम पड़त फुहार॥
झुकि झुकि लाल लली मुख निरखत मानत मोद अपार।
मानहुँ अरुण ‘बिन्दु’ पंकज पर भ्रमत भ्रमर बहुबार॥


ये सच है मोहन कृपा न करते

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ये सच है मोहन कृपा न करते,
तो कौन अधमों को फिर बचाता।
अगर न होते अधम ही जग में,
अधम उधारण कहाँ से जाता।
अनेक अपराध प्राणियों के,
क्षमा जो करते हैं यह सही है।
परन्तु जो अपराध ही न होते,
तो कौन उनसे क्षमा कराता।
ये माना कि उनकी दयालुता ने,
उन्हें परेशान कर ही दिया है।
मगर न होती दया की सोहरत,
तो उनके दर पर ही कौन जाता।
पलट वो सकते हैं कर्म बंधन,
तभी तो जगदीश हैं कहाते।
अगर हुकूमत न इतनी होती,
तो कौन हाकिम उन्हें बनाता।
न शौक से वो सिर पर उठाते,
अधीन दोनों की आफतों को।
तो क्या थी गरज पड़ी किसी को,
आँखों से ‘बिन्दु’ मोतीलड़ लुटाता।


जिनकी मधुर मोहनी शोभा लखि दृग होत निहाल,

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जिनकी मधुर मोहनी शोभा लखि दृग होत निहाल,
जो ब्रजवासिन के प्रिय बल्लभ सखा स्नेही ग्वाल।
ब्रज गोपीन के श्याम सलोने प्राणनाथ गोपाल,
जिनके मुख मुरलिया मनोहर गावत गीत रसाल।
मोर मुकुट पीताम्बर कटि तट चलत त्रिभंगी चाल,
राजत रोली तिलक ‘बिन्दु’ श्रीयदुकुल भूषण भाल॥


पतझड़ न खिज़ां है न गर्द ओ गुबार है,

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पतझड़ न खिज़ां है न गर्द ओ गुबार है,
दीवानों की ज़िन्दगी में सदा ही बहार है।
ज़िन्दादिली जहाँ है हम उस अंजुमन के है,
हम आशिक़े वतन हैं मगर ख़ुश वतन के हैं।
सोहबत पसंद भी है तो गुंचा वतन के हैं,
हम बुलबुल शैदा हैं मगर उस चमन के हैं,
जिसमें सिवाय गुल के न ख़ालिश है न ख़ार है।
दीवानों की ज़िन्दगी में सदा ही बहार है।

कोई भी अजी ज़िस्म के ख़ामोश नहीं हैं,
वस्ल-ए-जहाँ की उनको मगर होश नहीं है।
सब देखते सुनते भी हैं बेहोश नहीं है,
है नूर नशे में न नशे का ख़ुमार है।
दीवानों की ज़िन्दगी में सदा ही बहार है।

फ़ौलाद तसव्वुर की शरारत मरोड़ दी है,
फ़िक्रों की जो जंजीर बँधी है वो तोड़ दी है।
ख्वाहिशे हवा की हर चाल मोड़ दी है,
मल्लाह के हाथ ही कश्ती छोड़ दी है।
अब डूबी है सागर में या सागर के पार है,
दीवानों की ज़िन्दगी में सदा ही बहार है।

महबूब की याद में जब आते हैं आँसू,
आबादिए हस्ती को हिला जाते हैं आँसू।
सैलाब आबे इश्क़ का बढ़ा जाते हैं आँसू,
आँखों के ‘बिन्दु’ बनके बता जाते हैं आँसू।
दरिया-ए-दिल मौज है मीठी फुहार है,
दीवानों की ज़िन्दगी में सदा ही बहार है।


सदा अपनी रसना को रसमय बनाकर,

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सदा अपनी रसना को रसमय बनाकर,
हरि हर, हरि हर, हरि हर जपाकर।
इसी जप से कष्टों का कम भार होगा,
इसी जप से पापों का प्रतिकार होगा।
इसी जप से नर तन का श्रृंगार होगा,
इसी जप से तू प्रभु को स्वीकार होगा।
ये स्वासों की दिन रात माला बनाकर,
हरि हर, हरि हर, हरि हर जपाकर।
इसी तप से तू आत्म बलवान होगा,
इसी जप से तू कर्तव्य का ध्यान होगा,
इसी जप से संतुष्ट भगवान होगा,
अकेले ही या साथ सबको मिलाकर,
हरि हर, हरि हर, हरि हर जपाकर।
जो श्रद्धा से इस जप को रोज़ गाता,
तो उसका यही जप है जीवन विधाता,
यही जप पिता है यही जप है माता,
यही जप है इस जग में कल्याण दाता,
हरि का कोई रूप मन में बिठाकर,
हरि हर, हरि हर, हरि हर जपाकर।
ये जप जब तेरे मन को ललचा रहा हो,
वो रसिकों के रस पथ पर जा रहा हो,
मज़ा श्री हरि नाम का आ रहा हो,
हरि ही हरि हर तरफ़ छा रहा हो,
तो कुछ प्रेम ‘बिन्दु’ दृग से बहाकर,
हरि हर, हरि हर, हरि हर जपाकर।


जाता कभी स्वभाव न खल का,

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जाता कभी स्वभाव न खल का,
कितना ही सत्संग करे वह सुजन साधु निर्मल का।
मिश्री मिश्रित पय से सिंचन करो वृक्ष के थल का,
किन्तु स्वाद कड़वा ही होगा सदा नीम के फल का।
चाहे अमृत ही बन जाए अंजन नेत्र कमल का,
किन्तु उलूक नहीं कर सकता दर्शन रवि मंडल का।
नापाक प्रेम से लौ देकर मधु प्रसून कोमल का,
पर फुफकार छोड़ते ही उगलेगा सार गरल का।
काला कम्बल खूब धुला लो रंग न होता हल्का,
चिकने घट पर नहीं ठहरता एक ‘बिन्दु’ भी जल का।


कराल कलिकाल में जो तेरा,

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कराल कलिकाल में जो तेरा,
न हरि के सुमिरन से प्यार होगा।
तो फिर बता दे किस तरह—
अपार भव सिन्धु पार होगा।
विषय तथा खाना और सोना,
सुखों में हँसना दुखों में रोना।
यही रही ख़ासियत तो
पशुओं में तेरा शुमार होगा।
अभी तो माना कि मोह प्यालों-
को पी के तू अलमस्त हो रहा,
मगर तू पछताएगा कि जिस दिन,
नशे का आख़िर उतर होगा।
वो बागवाँ अपने इस चमन में,
खिला ख़ुद बनके गुल हज़ारों।
बता दे क्या पसंद तुझको,
या गुल की ख़ुशबू या ख़्वार होगा।
जो रूप बरसाएगा तड़प कर,
वो आबे रहमत के ‘बिन्दु’ एकदिन।
जो सामने उसके ख़ुद गुनाहों-
से अपने आप तू शर्मसार होगा॥


हाँ मेरा मोहन मुरली वाला।

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हाँ मेरा मोहन मुरली वाला।

हाँ मेरा नन्द-नन्दन ब्रज ग्वाला।
जिसे गोद में नन्द खिलाएँ,
जिसे माँ यशोदा धमकाएँ,
जिसे ब्रज के ग्वाल चिढ़ाएँ,
जिसे गोपियाँ नाच नचाए,
हाँ यही जीवन प्रेम का प्याला।
हाँ मेरा मोहन मुरली वाला॥

जिसमे दीनों के दिल की चाह थी,
जिसमें बेकसी की परवाह थी,
जिसमें दुखी अधीनों की आह थी,
जिसमें भक्तों के भावों की राह थी,
हाँ जिसमें जीवन का उजाला।
हाँ मेरा मोहन मुरली वाला॥

जिसका प्रेम के वश में आ जाना,
जिसका जिस्म था प्रेम खज़ाना,
जिसका प्रेमियों में था ठिकाना,
जिसका प्रेमियों ने रस जाना,
हाँ जिसका पत्रम पथ है निराला।
हाँ मेरा मोहन मुरली वाला॥

जिसने गोपियों को तरसाया,
जिसने ब्रह्मा को था भरमाया,
जिसने नख पर गिरिराज उठाया,
जिसने गोरस ‘बिन्दु’ चुराया,
हाँ जिसने भक्तों को मौज से पाला।
हाँ मेरा मोहन मुरली वाला॥


प्रेम ही है अपना सिद्धांत,

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प्रेम ही है अपना सिद्धांत,
जिसने बना दिया है जीवन अम्र कल्प कल्पान्त।
जप तप योग समाधि यत्न सब किए रहे उद्भ्रान्त,
मोहन मधुर मति लिखते ही हुए सकल भ्रम शान्त।
नहीं वृत्तियाँ बदली बस कर निर्जन वन एकान्त,
मन एकाग्र हुआ जब देखा रसिकजनों का प्रान्त।
संयम नियम योग हथ साधन करते रहे नितान्त,
बदल गई रुचि पढकर गणिका-अजामिल वृतान्त।
फूले-फिरते हैं जिस पर उद्धव से ज्ञान महान्त,
ब्रज गोपिका दृग ‘बिन्दु’ से भा रही वेदान्त॥


मैना: अरे तेरी इक इक श्वास अनमोल,

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मैना: अरे तेरी इक इक श्वास अनमोल,
रे मन तोता!
हरि-हरि बोल।
तोता: रसना ज्ञान कथा मत खोल,
मैना जग उपवन में डोल,
रंग-रंग के फूल खिले हैं, बड़े भाग से भोग मिले हैं,
सबके स्वाद टटोल, मैना! जग उपवन में डोल।
मैना: सपने में एक बाग़ लगाया, फल-फूलों से मन ललचाया,
जब छूने को हाथ बध्य, जाग पड़ा कुछ भी न पाया,
यथा ढोल में पोल, रे मन तोता!
हरि-हरि बोल।
तोता: यदि सपना है जग उपासना, जीव स्वप्न ही जीव वासना,
सपने की क्या स्वप्न कल्पना, सपने में सपना है अपना,
इस विचार को तोल, मैना! जग उपवन में डोल।
मैना: इस भ्रम में मत बन मतवाला, यह तन अमर प्रेम का प्याला,
जिसमें सतस्वरूप रस डाला, तू रस का है पीने वाला,
विष का ‘बिन्दु’ न बोल, रे मन तोता!
हरि-हरि बोल।


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