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Saturday, 29 December 2018

ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज

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ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज 
हुस्न-ए-नज़र-नवाज़ हरीफ़-ए-नज़र है आज 

हर राज़दाँ है हैरती-ए-जलवा-हा-ए-राज़ 
जो बा-ख़बर है आज वही बे-ख़बर है आज 

क्या देखिए कि देख ही सकते नहीं उसे 
अपनी निगाह-ए-शौक़ हिजाब-ए-नज़र है आज 

दिल भी नहीं है महरम-ए-असरार-ए-इश्क़ दोस्त 
ये राज़दाँ भी हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज 

कल तक थी दिल में हसरत-ए-अज़ादी-ए-क़फ़स 
आज़ाद आज हैं तो ग़म-ए-बाल-ओ-पर है आज

ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं

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ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं 
फ़ज़ा बहारीं है जिस के जल्वों से वो हरीफ़-ए-बहार हूँ मैं 

खटक रहा हूँ हर इक की नज़रों में बच के चलती है मुझ से दुनिया 
ज़हे गिराँ-बारी-ए-मोहब्बत कि दोश-हस्ती पे बार हूँ मैं 

कहाँ है तू वादा-ए-वफ़ा कर के ओ मिरे भूल जाने वाले 
मुझे बचा ले कि पाएमाल-ए-क़यामत-ए-इन्तिज़ार हूँ मैं 

तिरी मोहब्बत में मेरे चेहरे से है नुमायाँ जलाल तेरा 
हूँ तेरे जल्वों में महव ऐसा कि तेरा आईना-दार हूँ मैं 

वो हुस्न-ए-बे-इल्तिफ़ात ऐ 'ताजवर' हुआ इल्तिफ़ात-फ़रमा 
तो ज़िन्दगी अब सुना रही है कि उम्र-ए-बे-एतिबार हूँ मैं

हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे

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हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे 
आज भी वादा-ए-फ़र्दा नज़र आता है मुझे 

ख़लिश-ए-इश्क़ मिटेगी मिरे दिल से जब तक 
दिल ही मिट जाएगा ऐसा नज़र आता है मुझे 

रौनक़-ए-चश्म-ए-तमाशा है मिरी बज़्म-ए-ख़याल 
इस में वो अंजुमन-आरा नज़र आता है मुझे 

उन का मिलना है नज़र-बन्दी-ए-तदबीर ऐ दिल 
साफ़ तक़दीर का धोका नज़र आता है मुझे 

तुझ से मैं क्या कहूँ ऐ सोख़्ता-ए-जल्वा-ए-तूर 
दिल के आईने में क्या क्या नज़र आता है मुझे 

दिल के पर्दों में छुपाया है तिरे इश्क़ का राज़ 
ख़ल्वत-ए-दिल में भी पर्दा नज़र आता है मुझे 

इबरत-आमोज़ है बर्बादी-ए-दिल का नक़्शा 
रंग-ए-नैरंगी-ए-दुनिया नज़र आता है मुझे

नंग-ए-आशिक़ी है वो नंग-ए-ज़िन्दगी है वो

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हुस्न-ए-शोख़-चश्म में नाम को वफ़ा नहीं 
दर्द-आफ़रीं नज़र दर्द-आश्ना नहीं 

नंग-ए-आशिक़ी है वो नंग-ए-ज़िन्दगी है वो 
जिस के दिल का आईना तेरा आईना नहीं 

आह उस की बे-कसी तू न जिस के साथ हो 
हाए उस की बन्दगी जिस का तू ख़ुदा नहीं 

हैफ़ वो अलम-नसीब जिस का दर्द तू न हो 
उफ़ वो दर्द-ए-ज़िन्दगी जिस की तू दवा नहीं 

दोस्त या अज़ीज़ हैं ख़ुद-फ़रेबियों का नाम 
आज आप के सिवा कोई आप का नहीं 

अपने हुस्न को ज़रा तू मिरी नज़र से देख 
दोस्त! शश-जहात में कुछ तिरे सिवा नहीं 

बे-वफ़ा ख़ुदा से डर ताना-ए-वफ़ा न दे 
'ताजवर' में और ऐब कुछ हों बे-वफ़ा नहीं

मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए

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मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए 
ये ला-हासिल ही उम्र-ए-इश्क़ का हासिल न बन जाए 

मुझी पर पड़ रही है सारी महफ़िल में नज़र उन की 
ये दिलदारी हिसाब-ए-दोस्ताँ दर-दिल न बन जाए 

करूँगा उम्र भर तय राह-ए-बे-मंज़िल मोहब्बत की 
अगर वो आस्ताँ इस राह की मंज़िल न बन जाए 

तिरे अनवार से है नब्ज़-ए-हस्ती में तड़प पैदा 
कहीं सारा निज़ाम-ए-काएनात इक दिल न बन जाए 

कहीं रुस्वा न हो अब शान-ए-इस्तिग़ना मोहब्बत की 
मिरी हालत तुम्हारे रहम के क़ाबिल न बन जाए

मोहब्बत में ज़बाँ को मैं नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ कर लूँ

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मोहब्बत में ज़बाँ को मैं नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ कर लूँ
शिकस्ता दिल की आहों को हरीफ़-ए-ना-तवाँ कर लूँ

न मैं बदला न वो बदले न दिल की आरज़ू बदली
मैं क्यूँ कर ए'तिबार-ए-इंक़लाब-ए-ना-तवाँ कर लूँ

न कर महव-ए-तमाशा ऐ तहय्युर इतनी मोहलत दे
मैं उन से दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल को तो बयाँ कर लूँ

सबब हर एक मुझ से पूछता है मेरे होने का
इलाही सारी दुनिया को मैं क्यूँ कर राज़-दाँ कर लूँ
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