Wednesday, 19 February 2020
फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना
फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना
ठिकाना ढूँडे दौर-ए-ज़मीं-ओ-आसमाँ अपना
ख़ुदा जब्बार है हर बंदा भी मजबूर ओ ताबे है
दो आलम में नज़र आया न कोई मेहरबाँ अपना
निगाह-ए-मुज़्तरिब फिर ढूँडती है किस को हर शय में
ज़मीन अपनी अज़ीज अपने ख़ुदा-ए-दो-जहाँ अपना
गुज़रने को तो गुज़रे जा रहे हैं राह-ए-हस्ती से
मगर है कारवाँ अपना न मीर-ए-कारवाँ अपना
न वो परवाज़ की कुव्वत न वो दिल की उमंग अब है
हुई मुद्दत चमन छूटे क़फस है आशियाँ अपना
पहेली खुद थी हस्ती इश्क़ ने कुछ और उलझाई
कोई ऐ ‘सेहर’ क्या समझे नहीं मैं राज़-दाँ अपना
दावर ने बंदे बंदों ने दावर बना दिया
दावर ने बंदे बंदों ने दावर बना दिया
सागर ने क़तरे क़तरों ने सागर बिना दिया
बे-ताबियों ने दिल की ब-उम्मीदर-शरह-ए-शौक़
उस जाँ-नवाज़ को भी सितम-गर बना दिया
पहली सी लज़्ज़तें नहीं अब दर्द-ए-इश्क़ में
क्यूँ दिल को मैं ने ज़ुल्म का ख़ू-गर बना दिया
कैफियत-ए-शबाब से माज़ूर कुछ हुए
कुछ आशिकों ने भी उन्हें ख़ुद-सर बना दिया
‘सेहर’ उस निगाह-ए-मस्त पे क़ुर्बान क्यूँ न हो
जिस के करम ने ज़िंदा क़लंदर बना दिया