Wednesday, 19 February 2020
अब तो कुछ और भी अँधेरा है
अब तो कुछ और भी अँधेरा है
ये मिरी रात का सवेरा है
रह-ज़नों से तो भाग निकला था
अब मुझे रह-बरों ने घेरा है
आगे आगे चलो तबर वालो
अभी जंगल बहुत घनेरा है
क़ाफ़िला किस की पैरवी में चले
कौन सब से बड़ा लुटेरा है
सर पे राही की सरबराही ने
क्या सफाई का हाथ फेरा है
सुरमा-आलूद ख़ुश्क आँसुओं ने
नूर-ए-जाँ ख़ाक पर बिखेरा है
राख राख उस्तख़्वाँ सफ़ेद सफ़ेद
यही मंज़िल यही बसेरा है
ऐ मिरी जान अपने जी के सिवा
कौन तेरा है कौन मेरा है
सो रहो अब ‘हफीज़’ जी तुम भी
ये नई ज़िंदगी का डेरा है
आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने
आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने
ग़फ़लत ज़रा न की मिरे ग़फ़लत-शेआर ने
ओ बे-नसीब दिन के तसव्वुर ये ख़ुश न हो
चोला बदल लिया है शब-ए-इंतिज़ार ने
अब तक असीर-ए-दाम-ए-फ़रेब-ए-हयात हूँ
मुझ को भुला दिया मिरे परवरदिगार ने
नौहा-गारों को भी है गला बैठने की फ़िक्र
जाता हूँ आप अपनी अजल को पुकारने
देखा न कारोबार-ए-मोहब्बत कभी ‘हफ़ीज’
फ़ुर्सत का वक़्त ही न दिया कारोबार ने