Saturday, 8 December 2018

हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई

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हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई
जिस बार ख़िजां आई समझे कि बहार आई

आशोबे-नज़र से की हमने चमन-आराई,
जो शै भी नज़र आई गुलरंग नज़र आई

उमीदे-तलत्तुफ़ में रंजीदा रहे दोनों-
तू और तिरी महफ़िल, मैं और मिरी तनहाई

वां मिल्लते-बुलहवसां और शोरे-वफ़ाजूई
यां ख़िलवते-कमसुख़नां और लज़्ज़ते-रुसवाई

यकजान न हो सकिये, अनजान न बन सकिये
यों टूट गई दिल में शमशीरे-शनासाई

इस तन की तरफ़ देखो जो कत्लगहे-दिल है
क्या रक्खा है मकत्ल में, ऐ चश्मे-तमाशाई


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