Tuesday, 27 November 2018

अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब

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अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
मुझ दिल-जले को नींद न आई तमाम शब
 
चमक चली गई थी सितारों की सुबह तक, 
की आस्माँ से दीदा-बराई तमाम शब। 

जब मैंने शुरू क़िस्सा किया आँखें खोल दीं, 
यक़ीनी थी मुझ को चश्म-नुमाई तमाम शब
 
वक़्त-ए-सियाह ने देर में कल यावरी- सी की, 
थी दुश्मनों से इन की लड़ाई तमाम शब
 
तारे से तेरी पलकों पे क़तरे अश्क के, 
दे रहे हैं "मीर" दिखाई तमाम शब

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