Thursday, 27 December 2018
देख रहा है दरिया भी हैरानी से
देख रहा है दरिया भी हैरानी से
मैं ने कैसे पार किया आसानी से
नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ
कुछ रिश्ता है मेरा बहते पानी से
हर कमरे से धूप, हवा की यारी थी
घर का नक्शा बिगड़ा है मनमानी से
अब जंगल में चैन से सोया करता हूँ
डर लगता था बचपन में वीरानी से
दिल पागल है रोज़ पशीमाँ होता है
फिर भी बाज़ नहीं आता मनमानी से
अपना फ़र्ज़ निभाना एक इबादत है
आलम हम ने सीखा इक जापानी से
मैं ने कैसे पार किया आसानी से
नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ
कुछ रिश्ता है मेरा बहते पानी से
हर कमरे से धूप, हवा की यारी थी
घर का नक्शा बिगड़ा है मनमानी से
अब जंगल में चैन से सोया करता हूँ
डर लगता था बचपन में वीरानी से
दिल पागल है रोज़ पशीमाँ होता है
फिर भी बाज़ नहीं आता मनमानी से
अपना फ़र्ज़ निभाना एक इबादत है
आलम हम ने सीखा इक जापानी से
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