Thursday, 13 February 2020
नहीं नहीं नहीं अब वो पलट के आने का
नहीं नहीं नहीं अब वो पलट के आने का
ज़माने वालों में चर्चा है जिस ज़माने का
नहीं नहीं वो नहीं जिस का ख़ाब देखा था
कुछ और रंग है बदले हुए ज़माने का
हमः ग़ुरूर, सरापा फ़तूर महज़ फुज़ूर
ख़ुदा से दूर है इंसान इस ज़माने का
तिरी फ़िज़ूल सराई से उठता है ये सवाल
कि तू अजूबा है ऐ शैख़ किस ज़माने का
रहेंगे हो के ज़माने की बेरुखी का शिकार
जो लोग रुख़ नहीं पहचानते ज़माने का
न इस लिए जो 'वफ़ा' के कमाल से मुन्कर
की ये ग़रीब है शायर तिरे ज़माने का
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