Sunday, 1 March 2020

बाँधो, छबि के नव बन्धन बाँधो!

No comments :

बाँधो, छबि के नव बन्धन बाँधो!
नव नव आशाकांक्षाओं में
तन-मन-जीवन बाँधो!
छबि के नव--
भाव रूप में, गीत स्वरों में,
गंध कुसुम में, स्मित अधरों में,
जीवन की तमिस्र-वेणी में
निज प्रकाश-कण बाँधो!
छबि के नव--
सुख से दुख औ’ प्रलय से सृजन
चिर आत्मा से अस्थिर रज-तन,
महामरण को जग-जीवन का
दे आलिंगन बाँधो!
छबि के नव--
बाँधो जलनिधि लघु जल-कण में,
महाकाल को कवलित क्षण में,
फिर-फिर अपनेपन को मुझमें
चिर जीवन-धन! बाँधो!
छबि के नव--

रचनाकाल: जुलाई’१९३४


No comments :

Post a Comment

{js=d.createElement(s);js.id=id;js.src=p+'://platform.twitter.com/widgets.js';fjs.parentNode.insertBefore(js,fjs);}}(document, 'script', 'twitter-wjs');