Thursday, 5 December 2019
एक और सर्द रात
एक और सर्द रात
अंधेरे के ग्यारह बजे आज
और मेरी एक और सर्द रात
आंखे नींद से बोझिल होती हुई
पर दिल कहे के क्या करेगी सोकर आज
बदन पूरी तरह थकान से चूर हो रहा है
मानो उसके जाने का गम फिर ताजा हो रहा है
सोने को तो सो जाऊ पल भर में ही
मगर रूह पे फिर पुराने अहसासों का जादू हो रहा है
कुछ लाहसिल नाकामयाब ख्वाइशें फिर से दस्तक दे रही है
कोई आवाज कहती के तू सो जा , हम भी यही है
सो जाऊ गर आज भी तकिया उनकी बाजू का हो
सो जाऊ गर उनकी सांसो की आवाज मेरे कानों में हो
ढीठ कितना है ये दिल , सो दफा समझाये पे भी मानता नही
हर बार उस मुसाफिर का राह देखता है जो इस तरफ का रास्ता भी जनता नही
ये तो शुक्र है के तेरे दर्द के मारे सो जाती हु तो देख लेती हूं तुनको
वरना तो नींद से परियो से सालो से मेरा कोई वास्ता ही नही
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