Sunday, 28 May 2017
उम्र भर हम रहे शराबी से by meer taqi meer
दिल-ऐ-पुर खूँ की इक गुलाबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से
दिल दहल जाए है सहर से आह
रात गुज़रेगी किस खराबी से
खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आंखों की नीम-ख्वाबी से
काम थे इश्क में बहुत से 'मीर'
हम ही फ़ारिग हुए शिताबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से
दिल दहल जाए है सहर से आह
रात गुज़रेगी किस खराबी से
खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आंखों की नीम-ख्वाबी से
काम थे इश्क में बहुत से 'मीर'
हम ही फ़ारिग हुए शिताबी से
dil-e-pur_Khuu.N kii ik gulaabii se
umr bhar ham rahe sharaabii se
dil dahal jaaye hai sahar se
aah raat guzaregii kis Kharaabii se
khilanaa kam kam kalii ne siikhaa hai
us kii aa.Nkho.n kii niim_Khvaabii se
kaam the ishq main bahut se 'Meer'
ham hii faariG hue shitaabii se
-meer taqi meer
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