Monday, 24 June 2019

मेरे कुछ शेर

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वो उसकी तस्वीर थी के जिससे जी भर के बाते किया करती थी
वार्ना तो वो गली से गुजरे तो खिड़की भी अपनी बन्द रखा करती थी
चूमकर रखती थी तस्वीर उसकी मगर सामने उसके नजरें झुका के रखती थी

ये बात और है के बंद खिड़की के सुराखों से भी उसको देखा करती थी


खत्म होने को है मोहब्बतों के सिलसिले
खुदा जाने के फिर हम मिले ना मिले
चलो इक बार अलविदा कह

लग के फिर से उसके गले


मुझे भी है तुमसे काम बड़े,
रात को ख्वाबो में आना तो बताउंगी
तेरी यादे सोने भी नही देती
मेरा बस चला तो आज तुमको भी जगाऊंगी




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