Friday, 28 June 2019
सात आठ शेर saat aath sher
फिर मिला एक शख्स तन्हा सा
हजारो की भीड़ में कुछ जुदा सा
यू सबसे बात करता था
मगर रहता था खुद मैं डूबा सा
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तन्हाइयां, वीरानियाँ, रुसवाईयाँ, बेचैनियां,
कितना कुछ तो मिला इश्क़ मैं,
एक सुकून चला भी गया तो क्या हुआ
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तमाम उम्र तन्हाई मैं गुजरे तो भी तन्हाई की आदत नही होती
पर चार दिन उनके साथ क्या बिता लिये, आदत छूटती ही नही फिर
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तुम्हारी यादे शाम ऐ अवध की जैसी है
शाम होते ही खुद ब खुद नाचने लगती है आंखों में
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होंटो पे हँसी रखकर आज फिर दिन की शुरुवात करूँगी
खिड़की से देखूंगी खिलते फूलो को और तुमको याद करूँगी
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मैंने आंसू नही अंगारे पिये है
अब मत पूछना के जुबान से अंगारे क्यों बरसते है मेरी
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सच कहु तो अब उन्हें याद करने का दिल बिल्कुल भी नही करता
मगर उनकी यादे खुद ही बिना बुलाये चली आये तो क्या करूँ
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कभी कभी ऐसा लगता है के मैं सो रहा हु ओर
वो तकिये पे सर रख के अपनी जुल्फे मेरे सीने पे गिरा देती है
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जब भी बनती संवरती हु आईने को देखकर,
जाने कहा से उनकी आवाज कानों मैं कह जाती है के
'बाल खुले रखना'
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