Wednesday, 22 January 2020

सब्रे-वहशत असर न हो जाए

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सब्रे-वहशत असर न हो जाए
कहीं सहरा भी घर न हो जाए

हिज्रे-परदानशीं  में मरते हैं
ज़िन्दगी परदा-दर न हो जाए

कसरते-सिजदा  से वह नक़्शे-क़दम
कहीं पामाल-सर न हो जाए

मेरे तग़य्युरे-रंग  को मत देख
तुझको अपनी नज़र न हो जाए

मेरे आँसू न पोंछना देखो
कहीं दामान-तर  न हो जाए

बात नासेह से करते डरता हूँ
कि फ़ुग़ाँ बे-असर न हो जाए

ऐ क़यामत न आइयो जब तक
वह मेरी गोर न हो जाए

मनअ-ए-ज़ुल्म  है तग़ाफ़ुले-यार
बख़्त-बद  को ख़बर न हो जाए

ग़ैर से बेहिजाब मिलते हो
शबे-आशिक़  सहर  न हो जाए

ऐ दिल, आहिस्ता आह-ताबे-शिकन
देख टुकड़े जिगर न हो जाए


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