Wednesday, 22 January 2020
न देना बोसा-ए-पा गो फ़लक झुकता ज़मीं पर है
न देना बोसा-ए-पा गो फ़लक झुकता ज़मीं पर है
कि यह उतना ज़मीं के नीचे है जितना ज़मीं पर है
तड़पता है पड़ा शौक़े-शहादत ख़ाक और ख़ूँ में
गिरा कूचे में तेरे यह लहू किसका ज़मीं पर है
ख़िरामे-नाज़ ने किसके जहाँ को कर दिया बरहम
ज़मीं गिरती फ़लक पर है, फ़लक गिरता ज़मीं पर है
रहा उस कू में मिट्टी यार ले जाएँ तो ले जाएँ
कि पड़ता पाँव मानिन्दे-निशाने-पा ज़मीं पर है
फ़रिश्तो! ले चले! उस कू से क्यों जन्नत में तुम मुझको
भला क्या साकिनाने-चर्ख़ का दावा ज़मीं पर है
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