Friday, 17 January 2020
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए muddat hui hai yaar ko mehmaa
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए
जोश-ए-क़दह से बज़्म-ए-चिराग़ां किये हुए
करता हूँ जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़गां किये हुए
फिर वज़ा-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबां किये हुए
फिर गर्म-नाला हाये-शररबार है नफ़स
मुद्दत हुई है सैर-ए-चिराग़ां किये हुए
फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामान-ए-सद-हज़ार-नमकदां किये हुए
फिर भर रहा है ख़ामा-ए-मिज़गां ब-ख़ून-ए-दिल
साज़-ए-चमन-तराज़ी-ए-दामां किये हुए
बाहमदिगर हुए हैं दिल-ओ-दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा-ओ-ख़याल का सामां किये हुए
दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाये है
पिंदार का सनम-कदा वीरां किये हुए
फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अर्ज़-ए-मताअ़ ए-अ़क़्ल-ओ-दिल-ओ-जां किये हुए
दौड़े है फिर हरेक गुल-ओ-लाला पर ख़याल
सद-गुलसितां निगाह का सामां किये हुए
फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना
जां नज़र-ए-दिलफ़रेबी-ए-उन्वां किये हुए
माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशां किये हुए
चाहे फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू
सुर्मे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़गां किये हुए
इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़ुरोग़-ए-मै से गुलिस्तां किये हुए
फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
सर ज़रे-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबां किये हुए
जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत, कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानां किये हुए
"ग़ालिब" हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ां किये हुए
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