Wednesday, 19 February 2020
वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है
वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है
किसी से ख़ुश हो ये भी तय नहीं है
यहाँ की मसनदें सब के लिए हैं
ये मेरा घर है क़स्र-ए-कय नहीं है
अभी ग़ुंचा अभी गुल और अभी तुख़्म
तो क्यूँ कहिए कि हस्ती है नहीं है
तग़य्युर इर्तिक़ा दस्तूर-ए-फ़ितरत
न बदले जो वो कोई शय नहीं है
मगस की ख़ाक-ए-पा नुत्फ़ा इनब का
कशीद-ए-गुल मगस की क़य नहीं है
वो कैसी शख़्सियत जिस में न हो रूह
वो कैसा शीशा जिस में मय नहीं है
वो क्या झरना न जिस से राग फूटे
वो कैसा नग़मा जिस में लय नहीं है
वो फीका वाज़ जिस में कर्ब मादूम
वो झूठा साज़ जिस में नय नहीं है
वो क्या ‘वामिक’ जो निचला बैठ जाए
वो कैसा फ़ासला जो तय नहीं है
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