Wednesday, 19 February 2020
हसीनों के तबस्सुम का तकाज़ा और ही कुछ है
हसीनों के तबस्सुम का तकाज़ा और ही कुछ है
मगर कलियों के खिलने का नतीजा और ही कुछ है
निगाहें मुश्तबा हैं मेरी पाकीज़ा निगाहों पर
मिरे मासूम दिल पर उन को धोका और ही कुछ है
हसीनों से मोहब्बत है उन्हीं पर जान देता हूँ
मिरा शेवा है ये लेकिन ज़माना और ही कुछ है
भला क्या होश आएगा बुझेगी क्या लगी दिल की
ये आँचल से हवा देने का मंशा और ही कुछ है
ज़बान ओ अक़्ल ओ दिल तारीफ़ से जिस की हैं बेगाने
उसे सजदा जो करता है वो बंदा और ही कुछ है
तुझे हर शय में देखा ‘सेहर’ ने हर शय में पहचाना
मगर फिर भी है इक पर्दा वो पर्दा और ही कुछ है
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