Thursday, 13 February 2020
ग़म से उनके भी जिगर दाग़ दाग़ पाए हैं
ग़म से उनके भी जिगर दाग़ दाग़ पाए हैं
देखने में जो बशर बाग़ बाग़ पाए हैं
दिल का हश्र क्या हुआ ये ख़बर नहीं मगर
उस गली में सुर्ख़ सुर्ख़ कुछ सुराग़ पाए हैं
हर तरफ़ थे कल जहां बुलबुलों के चहचहे
उस चमन में क़ाबिज़ आज बूम-ओ-ज़ाग़ पाए हैं
आदमीयत आजकल, बेज़रों में हो तो हो
एहले-ज़र तो सब के सब बद दिमाग़ पाए हैं
रात थी बरात की उन की एक एक रात
जिन के मर्कद ऐ 'वफ़ा' बे-चराग़ पाए हैं।
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