Wednesday, 19 February 2020
दिन मुरादों के ऐश की रातें
दिन मुरादों के ऐश की रातें
हाए क्या हो गईं वो बरसातें
रात को बाग़ में मुलाक़ातें
याद हैं जैसे ख़्वाब की बातें
हसरतें सर्द आहें गर्म आँसू
लाई है बर्शगाल सौग़ातें
ख़्वार हैं यूँ मेरे शबाब के दिन
जैसे जाड़ों की चाँदनी रातें
दिल ये कहता है कुंज-ए-राहत हूँ
देखना ग़म-नसीब की बातें
जिन के दम से शबाब था ज़िंदा
है 'अख़्तर' वो इश्क़ की घातें
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