मोहन हम भी तुमसे रूठे! जान गए हम छली प्रपंची हो कपटी और झूठे, पहले शरण बुलाया हमको दे-देकर लोभ अनूठे, अब इस बार दरस देने में दिखलाए अँगूठे, सुनते हैं देते थे सबको तब सुख भर-भर मूठे, हमने शत-शत ‘बिन्दु’ भए दिए न टुकड़े जूठे॥
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