Wednesday, 12 February 2020
ये मेरी फितरत मैं नही था के तुझे सजा देती
मेरी फितरत नही थी के उसे सजा देती
वार्ना यकीन मानो उसकी हस्ती मिटा देती
ये मेरी परवरिश की तलब थी
के कदम कदम पर दुपट्टा संभाला
पर ये तेरी परवरिश का खोट था के तूने ये दुपट्टा बार बार उछाला
चाहती तो मैं भी तेरे हाथ काट देती
पर क्या करूँ ये मेरी परविरिष मैं नही था के तुझे सजा देती
कभी छम्मकचलो, छमिया और आइटम के नाम से आवाज लगाई
तूने जब जब मुझे देख सीटिया बजायी यू न समझना के मुझे नही दी सुनाई
चाहती तो तुझे पलट के जवाब देती
पर क्या करूँ ये मेरी फितरत मैं नही था के तुझे सजा देती
बार बार तूने रुसवा किया मुझे और फिर बदनामी का बोझ भी दिया
दामन को मैला किया तूने पहले और फिर खुद मेरे किरदार पर उंगली उठाई
चाहती तो तुझे तेरी बेटी बहन के आंचल के दाग दिखा देती
पर क्या करूँ ये मेरी फितरत मैं नही था के तुझे सजा देती
मेरी रुसवाई को अखबारों की सुर्खियां बना डाला
खुश तो बहुत होता होगा के तूने मेरा तमाशा बना डाला
कल शायद मेरी जगह तेरी खुद की बेटी होगी
क्योंकि मेरी फितरत नही के तुझे सजा देती
यकीन मानो तुझे पैदा करने वाली औरत भी अंदर रोती होगी
क्योंकि वो भी मेरी ही तरह बस ये ही सोचती ही रही होगी
के क्यों ये मेरी फितरत मैं नही था के तुझे सजा देती
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