नाज़ो-अदा की चोटें, सहना तो और शै है। ज़ख़्मों को देख लेता कोई, तो देखता मैं॥ बर्क़े जमाले-वहदत! तू ही मुझे बता दे। शोला तो दूर भड़का, फिर किसलिए जला मैं?
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