Saturday, 25 January 2020

सोज़ाँ ग़मे-जावेद से दिल भी है जिगर भी।

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सोज़ाँ ग़मे-जावेद से दिल भी है जिगर भी।
इक आह का शोला कि इधर भी है उधर भी॥

वो अंजुमने-नाज़ है और रंगे-तग़ाफ़ुल।
याँ मरहलये-आह भी, अन्दोहे-असर भी॥

वो शमअ़ नहीं है, कि हों इक रात के मेहमाँ।
जलते हैं तो बुझते नहीं हम वक़्ते-सहर भी॥

जीने के मज़े देख लिए तेरी बदौलत।
अब ओ दिले-नाकामे-तमन्ना कहीं मर भी॥

अपनी शबे-हिजराँ में नहीं दख़ले-तग़ैय्युर।
बातिल है यहाँ फ़लसफ़ये शामो-सहर भी॥

सुनता हूँ कि खिरमन से है बिजली को बहुत लाग।
हाँ एक निगाहे-ग़लत-अंदाज़ इधर भी॥


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