क़ैद करता मुझको लेकिन जब गुज़र जाती बहार। क्या बिगड़ जाता ज़रा-सी देर में सैयाद का॥ चोट देकर आज़माते हो दिले-आशिक़ का सब्र। काम शीशे से नहीं लेता कोई फ़ौलाद का॥
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