Friday, 24 January 2020

वो हसीं बाम पर नहीं आता

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वो हसीं बाम पर नहीं आता
चाँद अपना नज़र नहीं आता

हूक उठती नहीं है कब दिल से
मुँह को किस दिन जिगर नहीं आता

कौन इस बे-कसी में पुरसाँ है
होश दो दो पहर नहीं आता

ये भी सुनना था वाए ना-कामी
मरते हैं और मर नहीं आता

थी कभी बात बात में तासीर
अब दुआ में असर नहीं आता

खेल है क्या मिज़ाज-दाँ होना
काम ये उम्र भर नहीं आता

सादगी का हूँ उस की दीवाना
अभी जिस को सँवर नहीं आता

बे-ख़ुदी है कि छाई जाती है
होश आता नज़र नहीं आता

ये हसीं और इल्तिजाएँ ‘हफीज़’
रहम तुम को मगर नहीं आता


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