Thursday, 23 January 2020
ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं ।
ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं ।
अभी से कुछ दिल मुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं ।
ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन ज़ोरे सनाअत को ।
नई बंदिश है मजमूँ नूर के साँचें में ढलते हैं ।
बुरा हो इश्क का यह हाल है अब तेरी फ़ुर्कत में ।
कि चश्मे खूँ चकाँ से लख़्ते दिल पैहम निकलते हैं ।
हिला देंगे अभी हे संगे दिल तेरे कलेजे को ।
हमारी आहे आतिश-बार से पत्थर पिघलते हैं ।
तेरा उभरा हुआ सीना जो हमको याद आता है ।
तो ऐ रश्के परी पहरों कफ़े अफ़सोस मलते हैं ।
किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक को तेरे ।
तड़फते हैं फ़ुगाँ करते हैं औ करवट बदलते हैं ।
'रसा' हाजत नहीं कुछ रौशनी की कुंजे मर्कद में ।
बजाये शमा याँ दागे जिगर हर वक़्त जलते हैं ।
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