Tuesday, 27 November 2018
बात क्या आदमी की बन आई आस्माँ से ज़मीन नपवाई
बात क्या आदमी की बन आई
आस्माँ से ज़मीन नपवाई
आस्माँ से ज़मीन नपवाई
चरख ज़न उसके वास्ते है मदाम
हो गया दिन तमाम रात आई
हो गया दिन तमाम रात आई
माह-ओ-ख़ुर्शीद-ओ-बाद सभी
उसकी ख़ातिर हुए हैं सौदाई
उसकी ख़ातिर हुए हैं सौदाई
कैसे कैसे किये तरद्दद जब
रंग रंग उसको चीज़ पहुँचाई
रंग रंग उसको चीज़ पहुँचाई
उसको तरजीह सब के उपर दे
लुत्फ़-ए-हक़ ने की इज़्ज़त अफ़ज़ाई
लुत्फ़-ए-हक़ ने की इज़्ज़त अफ़ज़ाई
हैरत आती है उसकी बातें देख
ख़ुद सरी ख़ुद सताई ख़ुदराई
ख़ुद सरी ख़ुद सताई ख़ुदराई
शुक्र के सज्दों में ये वाजिब था
ये भी करता सदा जबीं साई
ये भी करता सदा जबीं साई
सो तो उसकी तबीयत-ए-सरकश
सर न लाई फ़रो के टुक लाई
सर न लाई फ़रो के टुक लाई
'मीर' नाचीज़ मुश्त-ए-ख़ाक अल्लाह
उन ने ये किबरिया कहाँ पाई
उन ने ये किबरिया कहाँ पाई
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