Sunday, 18 November 2018

मोहब्बत के कसीदे

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वो मोहब्बत के कसीदे पढ़ता रहा
मैं बूत बनी ऐतबार करती रही
वो खवाबो के कंबल बुनता रहा
मैं ख्यालो के अम्बर मैं उड़ती रही
बात यहां खत्म हो जाती तो भी कुछ नही था
वो चला जाता अपनी डगर
मैं भी अपनी दुनिया में खो जाती
आजाद मोहब्बत के जंजाल से हो जाती
पर मुझको खबर भी न लगी
के वो मेरी पलको की छांव में
मेरे ही पर कुतरता रहा।
अब आजाद हुई भी तो किस काम की
जब चिड़िया के पंख ही न रहे

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