Wednesday, 14 November 2018

आज रात

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आज रात को तारो वाले चादर के तले
बचपन के पुराने आस्मां के तले
सोना चाहती हु
फिर से हर रस्मो और कसमो से
आजाद होना चाहती हु
खुद के बाल फिर उलझे रहे
मगर अपनी गुड़िया के बाल सुलझाना चाहती हु
वो पुराणी सी चारपाई
सफ़ेद खादर की रजाई
दूध में लबालब मलाई
रंग बिरंगी चप्पले
झालर वाले कपडे
मिटटी की बर्तन
नीम का मंजन
सब कुछ फिर से पाना चाहती हु

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