Saturday, 29 December 2018
मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था
मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था
जो साथ न आने की क़सम खाए हुए था
दिल जुर्म-ए-मोहब्बत से कभी रह न सका बाज़
हालांकि बहुत बार सज़ा पाए हुए था
हम चाहते थे कोई सुने बात हमारी
ये शौक़ हमें घर से निकलवाए हुए था
होने न दिया ख़ुद पे मुसल्लत उसे मैं ने
जिस शख़्स को जी जान से अपनाए हुए था
बैठे थे 'शऊर' आज मेरे पास वो गुम-सुम
मैं खोए हुए था न उन्हें पाए हुए था
जो साथ न आने की क़सम खाए हुए था
दिल जुर्म-ए-मोहब्बत से कभी रह न सका बाज़
हालांकि बहुत बार सज़ा पाए हुए था
हम चाहते थे कोई सुने बात हमारी
ये शौक़ हमें घर से निकलवाए हुए था
होने न दिया ख़ुद पे मुसल्लत उसे मैं ने
जिस शख़्स को जी जान से अपनाए हुए था
बैठे थे 'शऊर' आज मेरे पास वो गुम-सुम
मैं खोए हुए था न उन्हें पाए हुए था
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